




2026-05-09 17:31:28
संवाददाता
नई दिल्ली। मैसूरु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत का हालिया संबोधन सुनने में किसी आदर्शवादी और लोकतांत्रिक विचारक के प्रवचन जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, समान नागरिक संहिता, सामाजिक समरसता और जाति-आधारित राजनीति पर जनता की सहमति और जागरूकता को आवश्यक बताया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि ‘कानून बनाने मात्र से समाज में बदलाव नहीं आता।’ सैद्धांतिक रूप से, इन बातों का कोई विरोध नहीं कर सकता। लेकिन जब इन आदर्शवादी शब्दों की कसौटी पर आरएसएस और उसकी राजनीतिक इकाई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पिछले एक दशक के कार्यों को कसा जाता है, तो कथनी और करनी का एक विशाल और पाखंडी अंतर स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आता है।
संघ प्रमुख का यह बयान एक ऐसे संगठन के दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जो मंचों से तो सबको साथ लेकर चलने की बात करता है, लेकिन जमीन पर उसकी पूरी राजनीतिक इमारत हम बनाम वे की नींव पर खड़ी है। मोहन भागवत ने अपने संबोधन में अपील की कि ‘लोग नारेबाजी और विभाजनकारी सोच से दूर रहें’ और भारत की ताकत उसकी विविधता में है। यह बात उस संगठन के प्रमुख कह रहे हैं जिसके अनुषांगिक दल जैसे- विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल आदि लगातार समाज में एक आक्रामक और ध्रुवीकृत विमर्श पैदा करने का काम करते हैं।
चुनावी विमर्श: यदि संघ वास्तव में सामाजिक समरसता और विविधता का सम्मान करता है, तो चुनाव आते ही भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा श्मशान-कब्रिस्तान, 80 बनाम 20, बुलडोजर और अब्बाजान जैसे विभाजनकारी शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाता है?
अल्पसंख्यकों में असुरक्षा: समाज के एक बड़े वर्ग विशेषकर अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कराने वाली नीतियां और बयानबाजिÞयां संघ परिवार के इकोसिस्टम से ही निकलती हैं। ऐसे में सामाजिक सौहार्द की बातें केवल एक बौद्धिक आवरण लगती हैं, जिसे अंतरराष्ट्रीय पाखण्डी मंचों और उदारवादी तबकों के सामने संगठन की छवि चमकाने के लिए ओढ़ा जाता है।
जनसंख्या नियंत्रण और यूसीसी: जन-सहमति का चोला
भागवत ने आपातकाल का उदाहरण देते हुए कहा कि नीतियों को जबरदस्ती लागू करने से जनता में नाराजगी बढ़ती है, इसलिए जनसंख्या नियंत्रण और यूसीसी के लिए समाज का समर्थन जरूरी है।
जबरदस्ती के प्रयास: इस बयान की सच्चाई तब तार-तार हो जाती है जब हम देखते हैं कि भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण कानून के ऐसे ड्राफ्ट लाए गए, जिनमें दो से अधिक बच्चे होने पर सरकारी सुविधाओं और नौकरियों से वंचित करने का कड़ा और दंडात्मक प्रावधान था। क्या यह आपातकाल जैसी सख्ती का आधुनिक संघी सोच का रूप नहीं था?
यूसीसी पर एकतरफा कार्रवाई: उत्तराखंड में यूसीसी को जिस तरह से लागू किया गया, क्या उसमें समाज के सभी वर्गों—विशेषकर आदिवासी समुदायों और अल्पसंख्यकों—की सहमति और लंबी सोच को शामिल किया गया? असल में, संघ परिवार इन मुद्दों को सुधार के बजाय एक बहुसंख्यकवादी एजेंडे के रूप में इस्तेमाल करता है। जब विरोध के कारण नीतियां अटकने लगती हैं, तब अचानक सहमति का राग अलापा जाने लगता है।
दोष समाज का या दल का?
भागवत ने बड़ी चतुराई से जाति आधारित राजनीति का ठीकरा जनता के सिर फोड़ दिया। उन्होंने कहा कि राजनेता जाति का उपयोग करते हैं क्योंकि समाज उसे महत्व देता है। यह एक अर्ध-सत्य है। सच तो यह है कि आरएसएस और भाजपा ने पिछले कुछ वर्षों में सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातिगत पहचानों को सबसे ज्यादा धार दी है। टिकटों का बंटवारा हो, मंत्रिमंडल का गठन हो या प्रशासनिक नियुक्तियां—भाजपा हर जगह जातिगत समीकरणों को बारीकी से तौलती है। पिछड़ों और अति-पिछड़ों को जोड़ने के नाम पर जो राजनीति की गई, उसने जातियों को मिटाया नहीं, बल्कि उनकी पहचान को और अधिक राजनीतिक बना दिया है। भागवत का यह कहना कि लोग काम और योग्यता के आधार पर वोट दें, उन राजनीतिक रणनीतियों का मजाक उड़ाने जैसा है जो पूरी तरह से जातिगत जनगणना के विरोध या पक्ष के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं। जाति और धर्म के आधार पर सबसे अधिक धु्रवीकरण भाजपा ही करती है।
सुविधाजनक विरोध: जब विपक्ष जातिगत जनगणना की मांग करता है, तो आरएसएस इसे समाज को बांटने वाला कदम बताता है। लेकिन चुनाव के समय जातियों के आधार पर रैलियां करना, विभिन्न जातियों के महापुरुषों की मूर्तियां लगाना और पिछड़े/दलित/श्रमिक वर्गों के उप-विभाजन का राजनीतिक लाभ उठाना, इसी संगठन की सोची-समझी षड्यंत्रकारी रणनीति का हिस्सा है। जातिवाद का दोष केवल समाज पर मढ़ना एक सफेद झूठ है। चूकि ब्राह्मणवाद सामाजिक व्यवस्था का मूल है।
सुविधाजनक बचाव: भागवत ने बड़ी सफाई से कहा कि ‘आरएसएस कोई सरकार नहीं है, बल्कि एक सामाजिक संगठन है, इसलिए वह कानून नहीं बनाता।’ यह तर्क तकनीकी रूप से सही हो सकता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह एक बड़ा भ्रम व छलावा है।
सत्ता का रिमोट कंट्रोल: आज देश की नीतियां, शिक्षा व्यवस्था और महत्वपूर्ण संस्थाओं में होने वाली नियुक्तियां नागपुर (आरएसएस मुख्यालय) की विचारधारा से सीधे तौर पर प्रभावित होती हैं। भाजपा के शीर्ष नेता, मंत्री और यहाँ तक कि मुख्यमंत्री भी संघ के स्वयंसेवक हैं। भागवत ने अपील की कि लोग ‘नारेबाजी से दूर रहें।’ विडंबना देखिए, आरएसएस और भाजपा की पूरी राजनीति ही नारों पर टिकी है। ‘जय श्री राम’ के नारे को एक राजनीतिक युद्ध-घोष में तब्दील करने वाली विचारधारा का प्रमुख जब नारेबाजी से बचने की सलाह देता है, तो यह पाखंड की पराकाष्ठा लगती है। व्यवहारिक बदलाव की बात करने वाले संघ ने आज तक अपने संगठन के भीतर शीर्ष नेतृत्व (सरसंघचालक और अन्य मुख्य पद) में कितनी विविधता दिखाई है? क्या संघ के भीतर जातिगत और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का वही पैमाना लागू है जिसकी उम्मीद वह समाज से करते हैं? जवाब नकारात्मक है।
मुखौटे और असलियत का फासला
आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व ऐसे संयमित, दार्शनिक और सहमति वाले बयान देकर एक उदारवादी मुखौटा तैयार करता है, ताकि इतिहास और अकादमिक बहसों में उन्हें एक समावेशी संगठन के रूप में दर्ज किया जा सके। वहीं दूसरी ओर, उनकी राजनीतिक और जमीनी मशीनरी समाज को बांटकर, धार्मिक भावनाएं भड़काकर और आक्रामक हिंदुत्व का सहारा लेकर सत्ता हासिल करने में जुटी रहती है। जनता को सोच बदलने की सलाह देने से पहले संघ प्रमुख को अपनी राजनीतिक शाखा (भाजपा) की कार्यप्रणाली को बदलने की सलाह देनी चाहिए। जब तक नफरत के बयानों पर लगाम नहीं लगती, जब तक नीतियों को थोपने की बजाय संसद में स्वस्थ बहस नहीं होती, और जब तक चुनाव जीतने के लिए समाज को जातियों और धर्मों में बांटना बंद नहीं होता, तब तक मोहन भागवत के ऐसे बयान महज शब्दों की बाजीगरी ही माने जाएंगे। असली बदलाव प्रवचनों से नहीं, बल्कि सत्ता के चरित्र में ईमानदारी लाने से होता है।





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