Sunday, 25th October 2026
Follow us on
Sunday, 25th October 2026
Follow us on

आरटीआई RTI से खुलासा

आरटीआई से खुलासा: ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई से मंत्रिमंडल सचिव ने कदम उठाने से किया था इनकार
News

2026-10-24 18:29:16

नई दिल्ली। भारत निर्वाचन आयोग के भीतर कामकाज और अधिकारियों के बीच अधिकारों के बंटवारे को लेकर चल रहा विवाद अब सूचना के अधिकार के तहत सामने आए दस्तावेजों से और स्पष्ट हुआ है। इन दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज पर सवाल उठाते हुए 29 जुलाई को मंत्रिमंडल सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। मंत्रिमंडल सचिवालय ने इन शिकायतों पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग तक पहुंचाया। ये जानकारी ऐसे समय पर सामने आई है जब आज ज्ञानेश कुमार को हटाने और चुनाव आयोग में सुधार को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन हो रहे हैं। इसका आह्वान नागरिक समाज और किसान संगठनों ने किया है।

संचार माध्यमों के विवरण के मुताबिक, मंत्रिमंडल सचिवालय ने यह तर्क दिया कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र उनकी व्यक्तिगत हैसियत में लिखे गए थे, न कि पूरे निर्वाचन आयोग की औपचारिक शिकायत के रूप में। सचिवालय ने आशंका जताई कि आयोग की औपचारिक पहल के बिना कार्यवाही करना एक संवैधानिक संस्था के कामकाज में कार्यपालिका के हस्तक्षेप के रूप में देखा जा सकता है।

सूचना के अधिकार से क्या-क्या सामने आया?

यह जानकारी सेवानिवृत्त नौसेना कैप्टन और पारदर्शिता कार्यकर्ता लोकेश के. बत्रा द्वारा दायर सूचना का अधिकार आवेदन के जवाब में जारी दस्तावेजों से सामने आई। बत्रा ने 24 सितंबर को आवेदन दिया था।

सूचना के अधिकार के अनुसार, मंत्रिमंडल सचिवालय के दस्तावेज बताते हैं कि:

29 जुलाई 2026: चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मंत्रिमंडल सचिव टी. वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे।

3 अगस्त: सचिवालय के एक टिप्पणी-पत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इन पत्रों पर उनकी राय लेने का प्रस्ताव रखा गया।

4 अगस्त: सचिवालय ने दर्ज किया कि पत्र दोनों चुनाव आयुक्तों ने व्यक्तिगत हैसियत में लिखे थे और इन्हें पूरे निर्वाचन आयोग की औपचारिक शिकायत नहीं माना जा सकता।

5 अगस्त: दोनों चुनाव आयुक्तों को पत्र प्राप्त होने की सूचना दी गई। इन पत्रों की प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, उसके स्थापना अधिकारी और मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रधान निजी सचिव को भी भेजी गईं।

इस खुलासे का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पत्र केवल कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को ही नहीं भेजे गए थे, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भी उनकी प्रतियां भेजी गई थीं।

मनीष गर्ग पर क्या आरोप लगाए गए थे?

दोनों चुनाव आयुक्तों की शिकायतों का मुख्य मुद्दा निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे में एकतरफा बदलाव था। विवरण के मुताबिक, मनीष गर्ग को 28 जुलाई को प्रशासनिक प्रभाग के उप चुनाव आयुक्त के संपर्क अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार मिला था। उस समय उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरू 9 अगस्त तक अवकाश पर थे। आरोप है कि अतिरिक्त प्रभार मिलने के कुछ ही घंटों के भीतर गर्ग ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशक स्तर के अधिकारियों और समकक्ष पद के अधिकारियों के बीच कार्य-विभाजन को बदलने का आदेश जारी कर दिया।

संधू और जोशी ने अपनी शिकायतों में कहा कि इस फैसले से पहले न तो निर्वाचन आयोग से चर्चा की गई और न ही संबंधित अधिकारियों से परामर्श लिया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस तरह के फैसले पहले से दिए गए मौखिक और लिखित निदेर्शों के विपरीत थे।

सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की संचिकाओं और चुनावी अभिलेखों से जुड़ा था विवाद

इस विवाद का एक अहम पहलू निर्वाचन आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की संचिकाओं के संचलन से भी जुड़ा था। विवरण के अनुसार, चुनाव आयुक्तों को इस बात पर आपत्ति थी कि सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना के अधीन आने वाली संचिकाओं के निपटारे और उन्हें आगे भेजने की प्रक्रिया में बदलाव किया गया। पहले ये संचिकाएं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पास जाती थीं।

विवरण के मुताबिक, सितंबर में विवाद का एक प्रमुख मुद्दा मतदाता सूची से जुड़ी जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण को लेकर भी सामने आया। चुनाव आयुक्तों को आशंका थी कि प्रस्तावित बदलावों से मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन से संबंधित अधिकारों का केंद्रीकरण हो सकता है, जबकि इन कार्यों में राज्य स्तर के अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग के राष्ट्रीय जालतंत्र में यही बदलाव किया गया था। राज्यों के अधिकारियों से यह अधिकार केंद्रीय नियंत्रण के अधीन हो गया। इसका आशय यह हुआ कि बिना दिल्ली की स्वीकृति के राज्य के चुनाव अधिकारी कुछ भी नहीं कर सकते थे, जबकि पहले यह कार्य निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी स्तर के अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में था। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी चोंगालिंगम ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र भेजकर इस पर आपत्ति दर्ज कराई थी।

मंत्रिमंडल सचिवालय ने कार्रवाई न करने के लिए क्या आधार लिया?

मंत्रिमंडल सचिवालय ने अपने टिप्पणी-पत्र में निर्वाचन आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता को कार्रवाई न करने की प्रमुख वजह बताया। सचिवालय के अनुसार, निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसे कार्यपालिका के हस्तक्षेप से स्वतंत्र रखकर कार्य करने की व्यवस्था की गई है। आयोग का कामकाज उसके अपने नियमों और दिशा-निदेर्शों से संचालित होता है।

सचिवालय ने कहा कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्रों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें पूरे आयोग की औपचारिक शिकायत नहीं माना जा सकता। आयोग की ओर से औपचारिक संवाद के अभाव में तत्काल कार्रवाई अनुचित हो सकती थी और इससे संवैधानिक संस्था के कामकाज में हस्तक्षेप का संदेश जा सकता था। सचिवालय ने मामले को अभिलेख पर रखने की सिफारिश भी की, ताकि मनीष गर्ग से संबंधित भविष्य के निर्णयों में इन शिकायतों पर विचार किया जा सके।



इस मामले में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने एक समाचार संस्थान से बातचीत में सवाल उठाया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों को मंत्रिमंडल सचिव के पास जाने की जरूरत क्यों पड़ी और क्या आयोग के भीतर इस मुद्दे पर विचार-विमर्श हुआ था। लवासा के अनुसार, पूरे घटनाक्रम के तथ्यों को स्पष्ट किया जाना जरूरी है। इसमें यह भी शामिल है कि दोनों आयुक्तों की आपत्तियों पर आयोग के भीतर चर्चा हुई थी या नहीं और उन्हें किस तरह लिया गया।

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने भी एक दूरदर्शन कार्यक्रम में सवाल किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पहले पूरे निर्वाचन आयोग की बैठक बुलाने का मार्ग क्यों नहीं अपनाया। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि आयोग के भीतर समाधान नहीं निकलता, तो क्या राष्ट्रपति के समक्ष मामला उठाया जा सकता था।

पूरे मामले का महत्व क्या है?

यह विवाद निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, वरिष्ठ अधिकारियों के बीच अधिकारों के बंटवारे और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाता है।

इस मामले में तीन अलग-अलग स्तर हैं:

दो चुनाव आयुक्तों की शिकायत: संधू और जोशी ने आरोप लगाया कि वरिष्ठ अधिकारी ने बिना पर्याप्त परामर्श के कार्य-विभाजन में बदलाव किया।

मंत्रिमंडल सचिवालय का रुख: सचिवालय ने शिकायतों को गंभीरता से लेने की बात कही, लेकिन उन्हें पूरे आयोग की औपचारिक शिकायत न मानते हुए सीधे कार्रवाई से परहेज किया।

Post Your Comment here.
Characters allowed :
02 अक्टूबर (1869) : महात्मा गांधी जयंती

02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

09 अक्टूबर (1924) : इमैनुअल सेकरन जयंती

13 अक्टूबर (1935) : नासिक के येवला सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा की

14 अक्टूबर (1956) : ऐतिहासिक धम्मदीक्षा दिवस: नागपुर दीक्षाभूमि में बाबा साहब द्वारा लाखों अनुयायियों संग बौद्ध धम्म ग्रहण किया गया।

15 अक्टूबर (1902) : कर्मवीर दादासाहेब भाऊराव कृष्णराव (बी. के.) गायकवाड़ जयंती

15 अक्टूबर (1931) : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती

16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

20 अक्टूबर (2026) : अशोक विजय दशमी

22 अक्टूबर (1947) : जनकवि अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) जयंती

25 अक्टूबर (1800) : लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले जन्मदिवस

27 अक्टूबर (1920) : भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन जयंती

29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

31 अक्टूबर (2004) : त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी समृति दिवस

2026-10-12 16:07:19