




2026-05-25 16:34:48
नई दिल्ली। भारत के डिजिटल और राजनीतिक इतिहास में शायद ही कभी ऐसा भूचाल आया हो। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की एक विवादित टिप्पणी से जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अब महज एक सोशल मीडिया का ट्रेंड नहीं रह गई है। दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दंभ भरने वाली बीजेपी को मीलों पीछे छोड़ते हुए, सीजेपी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स का आंकड़ा अविश्वसनीय रूप से 2 करोड़ से अधिक (22.6 मिलियन) हो चुका है।
दलित पहचान सामने आते ही बौखलायें संघी-ब्राह्मणवादी
लेकिन इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व डिजिटल क्रांति के बीच, भारतीय समाज की एक बेहद घिनौनी और कड़वी सच्चाई भी पूरी तरह से बेनकाब हो गई है। अमेरिका की प्रतिष्ठित बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में मास्टर्स कर रहे सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने जैसे ही सोशल मीडिया पर अपनी दलित पहचान उजागर की, वैसे ही राइट-विंग और एक खास दीमक रूपी ब्राह्मणवादी संघी विचारधारा का इकोसिस्टम बौखला गया। जो लोग कल तक सत्ता के खिलाफ इस पार्टी के तीखे व्यंग्य का मजा ले रहे थे, वे पलक झपकते ही अभिजीत को नीचा दिखाने और उन्हें जातीय गालियां देने पर उतर आए। इस पूरे विवाद की शुरूआत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (एक्स) पर तब हुई, जब रँ४३ वस्र उङ्म४ल्ल२ी’ नामक एक अकाउंट ने सीजेपी के बहुजन एजेंडे पर सवाल उठाया। यूजर ने पूछा कि पार्टी को लगातार कई ब्राह्मणवादी और जातिवादी अकाउंट्स का समर्थन मिल रहा है, ऐसे में क्या उखढ और उसके फाउंडर सामाजिक न्याय, आरक्षण और दलित अधिकारों का समर्थन करते हैं?
इस सीधे सवाल का अभिजीत दीपके ने जो बेबाक जवाब दिया, उसने इंटरनेट पर तूफान ला दिया। अभिजीत ने केवल एक पंक्ति में लिखा, मैं खुद एक दलित हूँ। मुझे उम्मीद है कि यह आपके सभी सवालों का जवाब दे देगा। अभिजीत का यह स्पष्ट जवाब कुछ ही घंटों में आग की तरह फैल गया और इसे 20 लाख (2 मिलियन) से ज्यादा बार देखा गया। लेकिन इस एक सच ने सोशल मीडिया पर बैठे जातिवादियों की पोल खोल कर रख दी। दलित पहचान सामने आते ही अभिजीत के खिलाफ एक सुनियोजित नफरती अभियान शुरू हो गया। सवर्ण श्रेष्ठता के अहंकार में डूबे अकाउंट्स ने तुरंत उनके खिलाफ मीम्स और अभद्र टिप्पणियों की बाढ़ ला दी। एक यूजर ने बाबासाहेब आंबेडकर के नीले प्रतीकों और हार्पिक (टॉयलेट क्लीनर) की तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए दलित अस्मिता का बेहद भद्दा और आपत्तिजनक मजाक उड़ाया। करीब 20,000 फॉलोअर्स वाले एक अन्य अकाउंट ने किसी व्यक्ति के पेशाब करते हुए एक अपमानजनक तस्वीर साझा की और जहर उगलते हुए लिखा, भीमटा स्पॉटेड, पार्टी रिजेक्टेड। इस नफरती भीड़ में मुंबई की लेखिका अनुराधा तिवारी भी कूद पड़ीं। उन्होंने अभिजीत पर निशाना साधते हुए लिखा, तो यह स्वघोषित जेन-जेड े) नेता मेरिट के खिलाफ है। जो भी जीरो कट-आॅफ का समर्थन करता है, वह विकास विरोधी है। अन्य यूजर्स ने भी अभिजीत पर निशाना साधते हुए आ गया डी (दलित) कार्ड और क्या अब कॉकरोचों को भी आरक्षण मिलेगा? जैसी ओछी और जातिगत टिप्पणियों की झड़ी लगा दी। इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब कोई बहुजन या दलित युवा व्यवस्था की आंखों में आंखें डालकर 2 करोड़ से ज्यादा युवाओं का नेतृत्व करता है, तो समाज का एक बड़ा तबका उसकी योग्यता को भूलकर उसे केवल उसकी जाति से तौलने लगता है। यह वही कॉकरोच जनता पार्टी है, जिसकी शुरूआत देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच और परजीवी कहे जाने के खिलाफ हुए भारी आक्रोश से हुई थी। आज इस आंदोलन की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर 2.06 करोड़ युवा इस पार्टी से जुड़ चुके हैं। सीजेपी अब सिर्फ एक हास्य या मीम पेज नहीं है, बल्कि यह जेन-जेड और बहुजन चेतना का वह अद्भुत संगम बन चुका है, जिससे सत्ता प्रतिष्ठान भी खौफ में आ गया है। यही कारण है कि भारत में एक्स (एक्स) पर पार्टी का अकाउंट पहले ही सरकार के लीगल नोटिस के बाद सस्पेंड किया जा चुका है। लेकिन डिजिटल सेंसरशिप और अब शुरू हुई इस भयंकर जातिगत नफरत के बावजूद, कॉकरोच जनता पार्टी की बढ़ती लहर रुकने का नाम नहीं ले रही है। 2 करोड़ से अधिक युवाओं का यह डिजिटल हुजूम अब भारतीय राजनीति की एक ऐसी हकीकत बन चुका है, जिसे न तो राइट-विंग की जातीय गालियों से दबाया जा सकता है और न ही सत्ता के डिजिटल बैन से।
संवैधानिक मर्यादा और 5-सूत्रीय एजेंडा: व्यंग्य के पीछे गंभीर संदेश
सीजेपी को महज एक फनी ट्रेंड समझने की भूल राजनीतिक दल न करें, क्योंकि इसके घोषणापत्र में शामिल 5 मांगें सीधे तौर पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी खामियों पर प्रहार करती हैं:
न्यायपालिका की निष्पक्षता: सेवानिवृत्ति के बाद कोई भी मुख्य न्यायाधीश राज्यसभा सीट या कोई अन्य सरकारी पद नहीं पाएगा।
मताधिकार की सुरक्षा: किसी भी राज्य में यदि कोई वैध वोट डिलीट होता है, तो मुख्य चुनाव आयुक्त को जिम्मेदार मानते हुए यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया जाएगा।
सच्चा महिला आरक्षण: संसद की सीटें बढ़ाए बिना महिलाओं को 50% सीधा आरक्षण दिया जाएगा, साथ ही कैबिनेट में भी 50% पद महिलाओं के लिए आरक्षित होंगे।
स्वतंत्र मीडिया की बहाली: बड़े कॉपोर्रेट घरानों (जैसे अंबानी-अडाणी) के स्वामित्व वाले मीडिया हाउसों के लाइसेंस रद्द कर स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जगह बनाई जाएगी।
दलबदल पर पूर्ण रोक: जो भी विधायक या सांसद चुनाव के बाद दल-बदल करेगा, उस पर 20 वर्षों तक चुनाव लड़ने और सार्वजनिक पद संभालने पर पूर्ण प्रतिबंध होगा।
जेन-जी और बहुजन चेतना का अद्भुत संगम
भारत का युवा, विशेषकर जेन-जी आज अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। यह वह पीढ़ी है जिसने कोरोना काल में शिक्षा का संकट देखा, जो रोजगार के सिकुड़ते अवसरों से परेशान है, और जिसने सरकारी परीक्षा पेपर लीक की मार झेली है। ऐसे में देश की शीर्ष अदालत से आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाली टिप्पणी के बाद उपजे गुस्से को, एक दलित युवा द्वारा हास्य, व्यंग्य और डिजिटल सक्रियता के माध्यम से सुनियोजित राजनीतिक आवाज में बदल देना भारत के भविष्य की राजनीति का एक नया संकेत है।
डिजिटल सेंसरशिप यह साबित करती है कि यह कॉकरोच आर्मी अब सत्ता के गलियारों में खलबली मचाने में पूरी तरह कामयाब रही है। दलित शोषितों, वंचितों को एक जुट होकर, मनुवादी संघियों के विरोध में खड़े होना होगा।
यह आज की सर्वव्यापी जरूरत है। इतिहास में ऐसे मौके हमेशा नहीं आते जब देश एक बदहवास व्यवस्था से गुजर रहा है तब अभिजीत दीपके नाम का युवक बिना खोजे, भारतीय युवाओं को अचानक मिल गया। हम सभी को उसका साथ देना चाहिए।





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