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29 सितम्बर 2006 का दिन स्वतंत्र भारत के सामाजिक और आपराधिक इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसने इक्कीसवीं सदी के उभरते ‘आधुनिक भारत’ के संवैधानिक मुखौटे को नोच कर रख दिया था। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के भंडारा जिले में स्थित खैरलांजी गाँव में एक ही दलित परिवार के चार सदस्यों—सुरेखा भोतमांगे, उनकी 17 वर्षीय पुत्री प्रियंका, तथा दो पुत्रों सुधीर (21 वर्ष) और रोशन (18 वर्ष)—की जिस नृशंसता से सरेआम हत्या की गई, उसने संपूर्ण मानवता को झकझोर दिया। खैरलांजी केवल एक जघन्य सामूहिक हत्याकांड नहीं था; यह जातिगत वर्चस्व, पुरुषवादी अहंकार, ग्रामीण सत्ता-संरचना और प्रशासनिक सांठगांठ का वह वीभत्स रूप था, जिसने न्याय प्रणाली की बुनियादी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए। यही कारण है कि 29 सितम्बर का दिन केवल एक त्रासदी की बरसी नहीं, बल्कि ‘खैरलांजी प्रतिरोध दिवस’ के रूप में दलित चेतना, नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के संघर्ष का अमिट प्रतीक बन चुका है।
खैरलांजी नागपुर से लगभग 140 किलोमीटर दूर स्थित मोहाड़ी तहसील का एक छोटा सा गाँव है। गाँव की सामाजिक संरचना में कुनबी (अन्य पिछड़ा वर्ग) और अन्य जातियों का संख्यात्मक और आर्थिक प्रभुत्व था। गाँव में दलित जातियों (महार समुदाय) के मात्र दो-तीन परिवार ही निवास करते थे। इस गाँव में भैयालाल भोतमांगे अपनी पत्नी सुरेखा और बच्चों के साथ रहते थे। भोतमांगे परिवार की जीवनशैली और वैचारिक रुख ही गाँव के दबंगों की आँखों की किरकिरी बन गया था। भैयालाल और सुरेखा पारंपरिक रूप से उच्च जातियों पर निर्भर रहने या उनकी बेगार (मुफ्त मजदूरी) करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने गाँव के किनारे अपनी लगभग 5 एकड़ असिंचित भूमि पर दिन-रात पसीना बहाकर खेती शुरू की। सुरेखा भोतमांगे एक अत्यंत जागरूक और स्वाभिमानी महिला थीं। उन्होंने तय किया था कि वे अपने बच्चों को किसी भी कीमत पर उच्च शिक्षित बनाएंगी। बड़ा बेटा सुधीर दृष्टिहीन (आंशिक रूप से) होने के बावजूद कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था। छोटा बेटा रोशन होनहार छात्र था और 12वीं में पढ़ रहा था। 17 वर्षीय प्रियंका एनसीसी कैडेट थी, अत्यंत मेधावी थी और सेना अथवा पुलिस सेवा में अधिकारी बनने का स्वप्न देख रही थी। दबंग ग्रामीणों ने भैयालाल के खेत के बीच से जबरन एक सार्वजनिक रास्ता निकालने की कोशिश की। सुरेखा ने इसका कानूनी विरोध किया और अपनी जमीन का समर्पण करने से इनकार कर दिया। सामंतवादी व्यवस्था में एक दलित परिवार—विशेषकर एक दलित महिला—का कानूनी रूप से अपने हक के लिए खड़े होना और उनके बच्चों का पढ़-लिखकर आगे बढ़ना गाँव के प्रभुत्वशाली तबके को अपनी सत्ता के लिए सीधी चुनौती लगा।
सुलगाता हुआ तनाव: 29 सितम्बर का नरसंहार अचानक उपजा कोई अपराध नहीं था, बल्कि यह हफ्तों तक चले सुनियोजित जातिगत द्वेष का चरम बिंदु था। 3 सितम्बर 2006 को गाँव के दबंगों ने भोतमांगे परिवार के एक रिश्तेदार, सिद्धार्थ गजभिये को रास्ते के विवाद और पुरानी रंजिश के चलते बेरहमी से पीटा। सिद्धार्थ को बचाने के लिए सुरेखा और उनके बेटे आगे आए। जब पुलिस में इस मामले की शिकायत दर्ज हुई, तो सुरेखा और उनके बेटे सुधीर ने गाँव के प्रभावशाली लोगों के खिलाफ अदालत और पुलिस में गवाही देने का साहस दिखाया। गाँव के दबंगों के लिए यह बात बर्दाश्त से बाहर थी कि एक दलित महिला उनके विरुद्ध पुलिस में बयान दे। 29 सितम्बर की सुबह पुलिस ने सिद्धार्थ गजभिये पर हमले के आरोप में गाँव के कुछ लोगों को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया। किंतु स्थानीय राजनीतिक प्रभाव और लचर कानून-व्यवस्था के चलते उन्हें उसी दोपहर स्थानीय अदालत से तुरंत जमानत मिल गई। जमानत मिलते ही प्रतिशोध की आग भड़क उठी। अपराधियों ने यह सबक सिखाने की ठानी कि जो भी उनकी सत्ता को चुनौती देगा, उसका नामोनिशान मिटा दिया जाएगा।
क्रूरता की पराकाष्ठा: 29 सितम्बर 2006 की शाम करीब 5:30 से 6:00 बजे का समय था। भैयालाल भोतमांगे खेत में काम कर रहे थे। घर पर सुरेखा, प्रियंका, सुधीर और रोशन मौजूद थे। लगभग 40 से 50 लोगों की एक उग्र, लाठी-डंडों, कुल्हाड़ियों और साइकिल की चेन से लैस भीड़ ने भोतमांगे के झोपड़ीनुमा घर को घेर लिया। भीड़ घर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुसी। सुरेखा और उनकी बेटी प्रियंका को घसीटते हुए बाहर निकाला गया। दोनों भाइयों (सुधीर और रोशन) ने अपनी माँ और बहन को बचाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन भीड़ ने उन्हें बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। सुरेखा और 17 वर्षीय प्रियंका के कपड़े फाड़ दिए गए और उन्हें पूरे गाँव के सामने निर्वस्त्र कर घुमाया गया। गाँव का कोई भी व्यक्ति या पड़ोसी उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आया; कई लोग मूकदर्शक बने तमाशा देखते रहे। प्रत्यक्षदर्शियों और स्वतंत्र मानवाधिकार जांच रिपोर्टों (यद्यपि स्थानीय पुलिस ने इसे बाद में दबाने का प्रयास किया) के अनुसार, दोनों महिलाओं के साथ अत्यंत वीभत्स शारीरिक और यौन अत्याचार किए गए। उनके गुप्तांगों पर घातक वार किए गए। सुधीर और रोशन के हाथ-पैर तोड़ दिए गए और उन्हें तड़पा-तड़पा कर मार डाला गया। सुरेखा और प्रियंका को पत्थरों, डंडों और धारदार हथियारों से तब तक पीटा गया जब तक कि उनके प्राण नहीं निकल गए। हत्या के बाद चारों शवों को एक बैलगाड़ी में लादा गया और गाँव से कुछ दूर बहने वाली नहर (धुपेवाड़ा नहर) में फेंक दिया गया, ताकि यह आत्महत्या या दुर्घटना का रूप ले सके। भैयालाल भोतमांगे ने पास की झाड़ियों में छिपकर इस पूरे तांडव की चीखें सुनीं। वे अकेले इतनी बड़ी हिंसक भीड़ के सामने कुछ करने की स्थिति में नहीं थे और किसी तरह अपनी जान बचाकर भागे।
पुलिस का पक्षपाती रवैया: घटना के बाद जब भैयालाल और अन्य रिश्तेदारों ने अंदलगांव पुलिस स्टेशन से संपर्क किया, तो पुलिस ने तुरंत कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। पुलिस पर स्थानीय नेताओं और रसूखदार आरोपियों को बचाने का खुला दबाव था। एफआईआर दर्ज करने में जानबूझकर देरी की गई और शुरूआत में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की कठोर धाराओं को लगाने से परहेज किया गया।
डॉक्टरों द्वारा साक्ष्यों से छेड़छाड़: जब नहर से सुरेखा और प्रियंका के निर्वस्त्र शव बरामद हुए, तो उनका पोस्टमार्टम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में किया गया। डॉक्टरों ने स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही यौन हिंसा और गंभीर चोटों को अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में दर्ज नहीं किया। पोस्टमार्टम इस तरह से तैयार किया गया जिससे बलात्कार या सामूहिक यौन उत्पीड़न की पुष्टि न हो सके, ताकि आरोपियों का बचाव हो सके। बाद में भारी जन-दबाव के चलते जब शवों का दोबारा पोस्टमार्टम कराया गया, तब तक प्रारंभिक जैविक साक्ष्य काफी हद तक नष्ट हो चुके थे।
राष्ट्रीय मीडिया का मौन: 29 सितम्बर से लेकर अक्टूबर के अंत तक—लगभग सवा महीने तक—देश के प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्रों और अंग्रेजी-हिंदी समाचार चैनलों पर खैरलांजी का कोई जिक्र नहीं था। मुंबई और दिल्ली के मीडिया घरानों के लिए एक दूरदराज के गाँव में एक गरीब दलित परिवार की सामूहिक हत्या कोई टीआरपी बटोरने वाली खबर नहीं थी। यह चुप्पी भारतीय मीडिया के जातिगत पूर्वाग्रहों और वर्ग-चरित्र का नंगा प्रदर्शन थी।
जन-प्रतिरोध और जनांदोलन: जब तंत्र ने न्याय देने से इनकार कर दिया, तो जनता स्वयं सड़कों पर उतर आई। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित दलित युवाओं, छात्रों, महिलाओं और सामाजिक कार्यकतार्ओं ने स्थानीय स्तर पर पर्चे बांटे, तथ्य-खोज समितियां बनाईं और सच्चाई को बाहर निकाला। नवंबर 2006 तक यह आक्रोश एक विराट जनांदोलन में तब्दील हो गया। नागपुर, अमरावती, यवतमाल, चंद्रपुर, नांदेड़ और मुंबई तक प्रदर्शन फैल गए। हजारों दलित और शोषित नागरिक सड़कों पर उतर आए। नागपुर में ऐतिहासिक दीक्षाभूमि के आसपास और संविधान चौक पर अभूतपूर्व प्रदर्शन हुए। युवाओं ने रेल रोको, रास्ता रोको आंदोलन किए और सरकारी इमारतों पर रोष प्रकट किया। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को न्याय देने के बजाय महाराष्ट्र पुलिस ने आंदोलनकारियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले दागे और हजारों युवाओं को जेलों में ठूंस दिया। आंदोलन को बदनाम करने के लिए इसे ‘नक्सल-प्रेरित’ करार देने की साजिशें रची गईं। किंतु जनता का प्रतिरोध इतना अडिग और प्रचंड था कि सरकार को झुकना पड़ा। अंतत: तत्कालीन राज्य सरकार को स्थानीय पुलिस अधिकारियों और डॉक्टरों के खिलाफ जांच बैठानी पड़ी और मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंपनी पड़ी।
क्या सचमुच मिला न्याय? सीबीआई जांच के बाद मामला भंडारा की एक विशेष फास्ट-ट्रैक अदालत में चला। लेकिन जांच और अभियोजन की शुरूआत ही इतनी दोषपूर्ण थी कि इसका सीधा असर अंतिम न्याय पर पड़ा। सीबीआई ने अदालत में जो आरोप पत्र दाखिल किया, उसमें से एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराएं हटा दी गईं। सीबीआई का विचित्र और शर्मनाक तर्क यह था कि ‘यह हत्या जातिगत घृणा के कारण नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रतिशोध और जमीन के विवाद के कारण हुई थी।’ इसके अतिरिक्त, मेडिकल साक्ष्यों के अभाव का हवाला देकर बलात्कार और यौन उत्पीड़न की धाराओं को भी हटा दिया गया। इस न्यायिक विडंबना ने पूरे दलित समाज को गहरे सदमे में डाल दिया। जिस हत्याकांड की जड़ ही जातिगत अहंकार थी, अदालत के दस्तावेजों में उसे एक सामान्य ‘आपराधिक रंजिश’ बना दिया गया। भैयालाल भोतमांगे ने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक न्याय की गुहार लगाई। वे अपनी पत्नी और बच्चों की तस्वीरें हाथ में लिए अदालतों के चक्कर काटते रहे। जनवरी 2017 में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गई—वे बिना यह देखे इस दुनिया से चले गए कि उनकी बेटी और पत्नी के हत्यारों को उनके किए की पूरी सजा मिली या नहीं। खैरलांजी केवल कानून-व्यवस्था की विफलता का मामला नहीं है; यह भारतीय समाज के आंतरिक ढांचे पर एक गहरा समाजशास्त्रीय प्रश्नचिह्न है।
दलित महिला की देह: जातिगत हिंसा में महिलाओं की देह को हमेशा से जाति के तथाकथित ‘सम्मान’ को कुचलने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। खैरलांजी में सुरेखा और प्रियंका को निर्वस्त्र करना और सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित करना केवल एक शारीरिक हमला नहीं था; यह संदेश देना था कि सत्ता संरचना में दलित महिला का आत्मसम्मान शून्य है। यह सामंती पितृसत्ता का सबसे घृणित रूप था। यह भ्रम अक्सर पाला जाता है कि शिक्षा और आर्थिक विकास से जातिगत पूर्वाग्रह समाप्त हो जाते हैं। खैरलांजी ने सिद्ध किया कि जैसे-जैसे हाशिए पर पड़े समुदाय शिक्षा और संपत्ति के माध्यम से आत्मनिर्भर होने का प्रयास करते हैं, वैसे-वैसे स्थापित प्रभुत्वशाली जातियों की असुरक्षा और आक्रामकता और अधिक हिंसक रूप में सामने आती है।
संस्थागत जातिवाद: पुलिस से लेकर अस्पताल और निचली अदालतों तक, जिस प्रकार साक्ष्यों को दबाया गया और आरोपियों को बचाने का प्रयास किया गया, वह यह दिखाता है कि राज्य के विभिन्न अंग जातिगत निष्ठाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं। डॉ. आम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था: ‘संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे होंगे, तो वह बुरा ही सिद्ध होगा।’ खैरलांजी ने बाबासाहेब की इस चेतावनी को अक्षरश: सच साबित किया। प्रत्येक वर्ष 29 सितम्बर को दलित, बहुजन, वामपंथी और प्रगतिशील संगठन खैरलांजी प्रतिरोध दिवस के रूप में मनाते हैं। यह दिवस केवल शोक का दिन नहीं है, बल्कि यह संघर्ष का संकल्प है।
प्रतिरोध दिवस हमें क्या याद दिलाता है?
●अधिकारों के प्रति अडिगता: सुरेखा भोतमांगे ने सामंती ताकतों के सामने घुटने टेकने से इनकार किया था। यह दिवस वंचितों को अपनी जमीन, अपने मान-सम्मान और अपनी नागरिक पहचान के लिए निडर होकर लड़ने की प्रेरणा देता है।
●संवैधानिक पहरेदारी: यह दिन याद दिलाता है कि कागज पर लिखे अधिकार तब तक सुरक्षित नहीं हैं जब तक कि नागरिक समाज उनके क्रियान्वयन के लिए राज्य तंत्र को कटघरे में खड़ा न रखे।
●एकजुटता की शक्ति: खैरलांजी के बाद जिस प्रकार पूरे देश के शोषित वर्ग ने सड़कों पर उतरकर सत्ता को चुनौती दी, वह यह स्पष्ट करता है कि संगठित जनआंदोलन ही न्याय की अंतिम गारंटी है।
निष्कर्ष: खैरलांजी नरसंहार स्वतंत्र भारत के इतिहास पर एक ऐसा अमिट कलंक है, जिसे समय की कोई भी धारा धो नहीं सकती। सुरेखा, प्रियंका, सुधीर और रोशन भोतमांगे की शहादत हमें यह याद दिलाती रहती है कि जातिवाद अतीत की कोई बंद किताब नहीं है, बल्कि इक्कीसवीं सदी की एक क्रूर, जीवंत और जानलेवा वास्तविकता है। 29 सितम्बर का प्रतिरोध दिवस हर संवेदनशील भारतीय नागरिक से यह आत्ममंथन करने की मांग करता है। क्या हम सचमुच एक स्वतंत्र और समतामूलक समाज बन पाए हैं? क्या एक मेधावी एनसीसी कैडेट प्रियंका भोतमांगे के सपनों को कुचलने वाला समाज कभी स्वयं को सभ्य कहलाने का हकदार हो सकता है? जब तक देश के किसी भी कोने में जाति के नाम पर किसी का स्वाभिमान रौंदा जाता रहेगा, तब तक खैरलांजी का प्रतिरोध जीवित रहेगा। यह प्रतिरोध दिवस केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि उस समतावादी, जातिविहीन और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण की निरंतर पुकार है, जिसका स्वप्न ज्योतिराव फुले और डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने देखा था।





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