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चरित्र हनन पर उतारू ‘घिनौना गोदी मीडिया’

माफीनाम काफी नहीं: नेहा सिंह राठौर
News

2026-10-24 18:36:02

भारतीय मीडिया की साख और स्वतंत्रता की स्थिति वैश्विक स्तर पर अत्यंत चिंताजनक है। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रÞीडम इंडेक्स 2026 में भारत 180 देशों की सूची में 157वें स्थान पर खिसक गया है, जो कि 2025 में 151वें स्थान पर था। प्रेस स्वतंत्रता के मामले में यह स्थिति बेहद गंभीर श्रेणी में आती है। पड़ोसी देशों नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश की रैंकिंग भी भारत से बेहतर है यहाँ तक कि पाकिस्तान भी 153वें स्थान पर रहकर भारत से बेहतर स्थिति में है। इसके कई मुख्य कारण हैं। एक तो यह कि मीडिया का मालिकाना हक अर्थात मीडिया घरानों का स्वामित्व कुछ गिने-चुने बड़े उद्योगपतियों के हाथों में केंद्रित है। इसके साथ ही कथित मुख्यधारा का यही मीडिया सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव के चलते पूरे विश्व में गोदी मीडिया के नाम से बदनाम हो चुका है। इतना ही नहीं बल्कि सरकार या सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले पत्रकारों को उत्पीड़न, धमकियों और शारीरिक हिंसा का भी सामना करना पड़ता है। अनेक मामलों में आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को दबाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों, मानहानि और देशद्रोह से जुड़े कड़े कानूनों का भी इस्तेमाल किया जा चुका है। वैश्विक विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय मुख्यधारा के न्यूज चैनलों पर गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे गंभीर और जनहित के मुद्दों के बजाय सनसनीखेज खबरों, मंदिर मस्जिद,हिन्दू मुस्लिम जैसे राजनीतिक ध्रुवीकरण और इनपर आधारित शोर-शराबे वाली बहसों को तरजीह दी जाती है। वैश्विक स्तर पर बीबीसी या न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे मीडिया संस्थान जहां अपनी खोजी और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं वहीँ इसके विपरीत, भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों और आर्थिक लाभ के दबाव में आकर केवल प्रेस रिलीज और सरकार के एजेंडे को ही आगे बढ़ाता हुआ दिखाई देता है। यही वजह है कि जहाँ एक ओर कथित मुख्यधारा के टीवी चैनल्स और अनेक बड़े अखबारों की साख अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गिरी है वहीं आज के दौर में भारत के अनेक स्वतंत्र लेखकों व डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और ईमानदार खोजी व सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखने वाले यूट्यूब पत्रकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए सराहा भी जा रहा है।

मुख्यधारा के इसी भारतीय मीडिया का हिस्सा कहे जाने वाले एबीपी नेटवर्क के डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पिछले दिनों एक ऐसा झूठा व घिनौना प्रसारण किया जिससे गोदी मीडिया का चरित्र एक बार फिर बेनकाब हो गया। सत्ता से सवाल पूछने वाली भारत की एक जानी मानी लोक गायिका नेहा सिंह राठौर से जुड़ी एक भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से गलत खबर एबीपी न्यूज पर प्रकाशित की गई। इस रिपोर्ट में नेहा का नाम एक हॉस्टल में चलने वाले कथित सेक्स रैकेट से जोड़ने जैसी बात सामने आई थी। इस खबर के प्रकाशित होते ही नेहा सिंह राठौर ने आरोप लगाया कि एबीपी न्यूज चैनल उन्हें दुर्भावनापूर्ण तरीके से वैश्या और कॉल गर्ल के रूप में चित्रित करना चाहता है। उन्होंने इसे सरकार से सवाल पूछने पर उनकी छवि धूमिल करने और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की सुपारी पत्रकारिता बताया। हालांकि विवाद बढ़ने और आलोचनाएं होने के बाद, एबीपी न्यूज ने अपनी गलती स्वीकार की। 17 अक्टूबर 2026 को चैनल ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के जरिए इस त्रुटिपूर्ण प्रसारण पर खेद व्यक्त किया और सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। चैनल ने स्पष्ट किया कि यह एक तथ्यात्मक भूल थी और उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। खबर है कि एबीपी नेटवर्क ने इस संपादकीय चूक को गंभीरता से लेते हुए अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म के तीन प्रमुख कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त भी कर दिया है। एबीपी न्यूज डिजिटल से तीन लोगों को प्रबंधन द्वारा निष्कासित किया जा चुका है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस घटना से दूसरे गोदी मीडिया हाउस में कार्यरत लोग भी सबक लेते हुये झूठी,मनगढ़ंत व किसी बेगुनाह का चरित्र हनन करने वाली खबरों को क्रॉसचेक किये बिना प्रकाशित या प्रसारित करने से परहेज करेंगे। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुये सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर संबंधित नियामक और मीडिया स्व-नियामक संस्थाओं के माध्यम से 15 दिनों के भीतर समयबद्ध कार्रवाई और रिपोर्ट मांगी है।

परन्तु सवाल यह उठ रहा है कि यह कोई चूक या त्रुटि थी अथवा जानबूझकर किया गया आपराधिक कृत्य ? नेहा सिंह राठौर ने भी चैनल की माफी को अस्वीकार करते हुए स्पष्ट किया है कि वे इस मामले को लेकर अदालत जाएंगी और कानूनी लड़ाई लड़ेंगी। यहां यह सवाल पूछना लाजिमी है कि आखिर किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों की जांच करना जरूरी है भी या नहीं ? अगर कोई खबर गलत साबित होती है, तो क्या केवल मुआफी मांग लेना भर पर्याप्त है? निश्चित रूप से नेहा सिंह राठौड़ का चरित्र हनन करने के घिनौने प्रयास का यह मामला मीडिया की जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। बेशक यदि कोई न्यूज चैनल या डिजिटल प्लटफॉर्म कोई मनगढ़ंत खबर चलाकर किसी महिला को अपमानित करता है तो उस न्यूज चैनल की विश्वसनीयता तो खत्म होती ही है साथ ही पीड़ित महिला की अनंत तकलीफें भी उसी अफवाहों से शुरू होती हैं। यह संतोष की बात है कि राष्ट्रीय महिला आयोग ने नेहा का नाम जोड़कर चलाई गई एबीपी न्यूज की झूठी व घटिया खबर का स्वत: संज्ञान लिया है। उम्मीद की जानी चाहिये कि दोषियों के खिलाफ सख़्त कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।

लेकिन यह पूरा मामला चूँकि सत्ता की मुखर आलोचक के रूप में अपनी पहचान रखने वाली लोक गायिका नेहा राठौर व सत्ता की चापलूसी में दंडवत करते रहने वाले शुद्ध व्यावसायिक मानसिकता वाले मीडिया घराने से जुड़ा है इसलिये यह संदेह होना भी जायज है कि यह वास्तव में भूलवश या गलती से किया गया प्रसारण था अथवा जानबूझकर किसी के इशारे पर या किसी को खुश करने के लिये किया गया अपराध ? यह तो कानूनी कार्रवाई के द्वारा पता चल सकेगा या फिर इस मामले को लेकर संबंधित मीडिया हॉउस से निष्कासित किये गये कर्मचारियों की स्वीकारोक्ति इस मामले का पटाक्षेप कर सकती है। परन्तु फिलहाल इस घटना से देश और दुनिया में गिरती भारतीय मीडिया की साख के बीच में ही यह सन्देश फिर चला गया है कि घिनौना गोदी मीडिया चरित्र हनन पर उतारू हो चुका है। - निर्मल रानी

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02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

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16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

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