




2026-07-04 15:30:11
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर इन दिनों सिर्फ 48 डिग्री के जानलेवा तापमान से नहीं, बल्कि देश के लाखों छात्रों और युवाओं के उबलते आक्रोश से भी सुलग रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले पिछले 14 दिनों से एक ऐसा धरना-प्रदर्शन चल रहा है, जो देश के सड़े-गले और भ्रष्ट हो चुके शिक्षा तंत्र की पोल खोल रहा है। इस आंदोलन के केंद्र में हैं लद्दाख के प्रख्यात शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो छात्रों के भविष्य को निगल रहे पेपर लीक माफिया और इस पूरे कुप्रबंधन के खिलाफ भूख हड़ताल पर बैठे हैं। उनकी और वहां मौजूद हजारों छात्रों की स्पष्ट मांग है: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तत्काल इस्तीफा। लेकिन विडंबना देखिए, जिस देश में युवाओं को डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) कहकर सत्ता के गलियारों में तालियां पीटी जाती हैं, उसी देश की सरकार ने इन युवाओं की चीखों पर अपने कान पूरी तरह से बंद कर लिए हैं। देश में एक तरफ आस्था के नाम पर चढ़ाए गए मंदिरों के दान बॉक्स से करोड़ों की चोरी हो रही है, और दूसरी तरफ देश के करोड़ों युवाओं की मेहनत, उनके सपनों और उनके भविष्य की चोरी पेपर लीक के जरिए की जा रही है। परीक्षा माफिया और सरकारी तंत्र की मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर पेपर लीक होना असंभव है। छात्र सालों-साल बंद कमरों में अपनी जवानी खपा देते हैं, उनके माता-पिता अपना पेट काटकर बच्चों की फीस भरते हैं, और जब परीक्षा का दिन आता है तो पता चलता है कि पेपर तो पहले ही बिक चुका है। यह सिर्फ एक परीक्षा का रद्द होना नहीं है, यह लाखों परिवारों की उम्मीदों का कत्ल है। और इसके बावजूद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा न होना, इस बात का प्रमाण है कि इस भ्रष्ट सिस्टम में ऊपर से लेकर नीचे तक सब एक-दूसरे को बचाने में लगे हुए हैं।
सत्ता की निरंकुशता और गोदी मीडिया का बहिष्कार
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया की रीढ़ आज किस कदर टूट चुकी है, यह जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन चीख-चीख कर बता रहा है। मोदी सरकार की तरफ से इस आंदोलन पर एक सोची-समझी और भयानक चुप्पी साध ली गई है।
सरकार का यह रवैया हैरान नहीं करता, क्योंकि पिछले कुछ सालों में सत्ता का चरित्र ही ऐसा बन गया है जहां जवाबदेही नाम की कोई चीज नहीं बची है। लेकिन जो बात सबसे ज्यादा चुभती है, वह है मुख्यधारा के मीडिया—जिसे आज जनता गोदी मीडिया के नाम से पुकारती है—का बेशर्म रवैया। पांच दिन से देश का एक सम्मानित नागरिक और हजारों छात्र तपती सड़क पर बैठे हैं, लेकिन किसी भी बड़े न्यूज चैनल के कैमरे का रुख जंतर-मंतर की तरफ नहीं है। बड़े-बड़े अखबार, जिनके पन्ने सरकारी विज्ञापनों से पटे रहते हैं, उन्होंने इस खबर को पूरी तरह से ब्लैकआउट कर दिया है। ये मीडिया संस्थान मोदी सरकार की गुलामी करते हुए उसे हर उस खबर से बचाने में लगे हैं, जो उसकी झूठी विश्वगुरु वाली छवि पर दाग लगाती हो। जब देश का युवा सड़क पर अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है, तब यह बिकाऊ मीडिया सत्ता के दरबार में दरबारी राग अलापने में व्यस्त है।
छात्रों से ज्यादा पुलिस का पहरा
सरकार का डर इस कदर हावी है कि उसने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे छात्रों को डराने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी झोंक दी है। जंतर-मंतर पर छात्रों के इस प्रदर्शन में सरकार ने इतनी बड़ी मात्रा में पुलिस बल तैनात कर रखा है कि कई बार देखने में आता है कि वहां प्रदर्शनकारियों से ज्यादा खाकी वर्दियां नजर आती हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे ये छात्र कोई आतंकवादी हों या देश के लिए बहुत बड़ा खतरा हों। दरअसल, यह भारी पुलिस बल सरकार के उस खौफ का प्रतीक है, जो उसे सच्चाई से लगता है। सरकार किसी भी तरह से संवाद करने या समस्या का समाधान निकालने के बजाय, सिर्फ बल प्रयोग करके इस प्रदर्शन को कुचलना चाहती है। यह एक निरंकुश शासक की निशानी है, जो अपने ही देश के भविष्य को बूटों तले रौंदने से गुरेज नहीं करता।
शहीद होकर जंग नहीं जीती जाती
इस पूरे आंदोलन का सबसे संवेदनशील और चिंताजनक पहलू सोनम वांगचुक का स्वास्थ्य है। वांगचुक भारत के उस लद्दाख क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं, जहां गर्मियों के चरम दिनों में भी तापमान 8 से 10 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना रहता है। ऐसे ठंडे और शांत वातावरण में रहने वाले व्यक्ति का दिल्ली की 48 डिग्री सेल्सियस की झुलसा देने वाली और जानलेवा गर्मी में भूख हड़ताल पर बैठना सीधे तौर पर खुदकुशी करने जैसा है। लू के थपेड़ों और डामर की पिघलती सड़क के बीच उनका शरीर हर पल जवाब दे रहा है, लेकिन उनका हौसला डिगा नहीं है। हालांकि, यहां हमें बेहद गंभीरता से इस बात को प्रमुखता से रखना होगा और छात्रों व वांगचुक जी से अपील करनी होगी कि जंग शहादत देकर नहीं, बल्कि दुश्मन को मात देकर जीती जाती है। तानाशाह और अंधी हो चुकी सरकारें कभी किसी की शहादत का मोल नहीं समझतीं। इस सरकार को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि 48 डिग्री की गर्मी में कोई इंसान अपनी जान गंवा दे। उनका एक ही लक्ष्य है—इस प्रदर्शन को किसी भी तरह से कुचल देना या इग्नोर करके खत्म कर देना। अगर वांगचुक जी को कुछ हो जाता है, तो यह इस निर्दयी सरकार के लिए महज एक आंकड़ा होगा, लेकिन देश के लिए यह एक अपूरणीय क्षति होगी। हमें यह समझना होगा कि जिंदा रहकर ही लड़ाई लड़नी होगी। यह एक लंबी और थका देने वाली लड़ाई है। यह लड़ाई सिर्फ एक शिक्षा मंत्री को हटाने की नहीं है, बल्कि उस पूरे सड़े हुए सिस्टम को बदलने की है जिसने हमारे देश को खोखला कर दिया है। इसके लिए ऊर्जा की, रणनीति की और सबसे बढ़कर—जिंदा रहने की जरूरत है। जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन सिर्फ कुछ छात्रों या एक वांगचुक का प्रदर्शन नहीं है; यह उस हर भारतीय का प्रदर्शन होना चाहिए जो इस देश में एक ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था चाहता है। मोदी सरकार का यह अहंकारी रवैया, पुलिस का दमनचक्र और गोदी मीडिया का बहिष्कार इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। छात्रों और सोनम वांगचुक की मांगें पूरी तरह से जायज हैं। पेपर लीक के दोषियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही, आंदोलनकारियों को अपनी सेहत और जान की हिफाजत भी करनी होगी। सत्ता की इस बहरी दीवार को गिराने के लिए शहादत की नहीं, बल्कि एक लंबे, अनुशासित और जीवंत संघर्ष की आवश्यकता है। भविष्य की इस लड़ाई में, भविष्य को जिदा रहना ही होगा।
लोगों को खाते देख सोनम हुए दुखी
पिछले छह दिनों से जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक वहां लोगों को खाते-पीते देखकर उनका मन दुखी हो गया उन्होंने वहां पर आये लोगों से उनके साथ बैठकर कम से कम एक दिन अनशन रखने की अपील की।
बहुजन स्वाभिमान संघ देश के जागरूक और संवेदनशील व्यक्तियों से अपील करता है कि देश को अहंकारी सरकार से बचाने के लिए सभी को इस आंदोलन से जुड़ना चाहिए और जबतक शिक्षा मंत्री और ऐसी अहंकारी सरकार शिक्षा में बनी रहेगी तब तक ये आंदोलन जारी रहना चाहिए। यह सवाल सिर्फ वहां अनशन पर बैठे लोगों की जिंदगी का ही नहीं है बल्कि देश की जो आज हालत है उसे देखकर देश के नौजवान व शिक्षित लोग परेशान है। और वे चाहते हैं कि ऐसी अहंकारी संघी सरकार जल्द से जल्द इस देश से विदा होनी चाहिए। ताकि यह देश अपनी खोई हुई अस्मिता को वापस पा सके। जो हमारे पूर्वजों ने सैंकड़ो सालों में कमाया है उसे बर्बाद ना होने दें। यह हम सभी का कर्तव्य बनता है।





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