




2026-03-07 14:56:50
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (supreme court of india) की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना (b v nagarathna) ने कहा कि एक जज को अपना न्यायिक कर्तव्य का पालन करते समय सही फैसला लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए, भले ही इससे उन्हें प्रमोशन मिलना बंद हो जाए या सत्ता में बैठे लोग नाराज हो जाएं। लाइव लॉ (Live law) के मुताबिक, जस्टिस नागरत्ना ने केरल उच्च न्यायालय (high court) में दूसरा जस्टिस टीएस कृष्णमूर्ति अय्यर (justice ts krishnamoorthy iyer) मेमोरियल व्याख्यान देते हुए इस बात पर जोर दिया कि न्यायाधिशों को राजनीतिक दबाव, संस्थागत हस्तक्षेप या लोकप्रियता से मुक्त होकर फैसला देना चाहिए। उन्होंने न्यायिक स्वतंत्रता में जजों की असहमति को भी महत्वपूर्ण बताया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ केवल राजनीतिक दबाव, संस्थागत हस्तक्षेप या लोकप्रिय मांगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रत्येक न्यायाधीश को अपने सहयोगियों की राय से असहमत होने या उनसे भिन्न मत रखने की स्वायत्तता भी शामिल है।
असहमतिपूर्ण राय बौद्धिक स्वायत्तता की अभिव्यक्ति
जस्टिस नागरत्ना के हवाले से लिखा है कि न्यायिक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाव तक ही सीमित नहीं है। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक न्यायाधीश को कानून के संबंध में अपना सुविचारित दृष्टिकोण बनाने और व्यक्त करने की स्वतंत्रता हो, भले ही वह दृष्टिकोण सहयोगियों से भिन्न हो। उल्लेखनीय है कि जस्टिस नागरत्ना, जो 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में हैं, अपने एकल असहमति वाले मतों के लिए व्यापक रूप से जानी जाती हैं। इसमें नोटबंदी मामले में संविधान पीठ में दिया गया उनका असहमति मत और 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्ति की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में उनकी आपत्ति शामिल है।
इस संबंध में न्यायाधीश ने कहा कि अलग और असहमतिपूर्ण राय बौद्धिक स्वायत्तता (Intellectual Autonomy) की अभिव्यक्ति हैं, और ये अभिव्यक्तियां, जो केवल संस्थागत अखंडता के लिए बिना किसी भय या पक्षपात के दी जाती हैं, ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सबसे प्रबुद्ध रूप’ हैं।
जस्टिस नागरत्ना आगे कहती हैं, ‘न्यायिक राय कोई समझौता पत्र नहीं है; यह संवैधानिक दृढ़ विश्वास की अभिव्यक्ति है। यदि कानून, जैसा कि हम समझते हैं, स्पष्टता-यहां तक कि बेबाकी-की मांग करता है, तो आम सहमति के लिए उसमें नरमी लाना एक प्रकार का समझौता है जिसे हम स्वीकार करने को तैयार नहीं होंगे। उन्होंने आगे कहा कि बाहरी प्रभाव से मुक्ति के अलावा, न्यायिक स्वतंत्रता न्यायिक संस्था के भीतर से भी सूक्ष्म रूप से कार्य करती है।
इस दौरान जस्टिस नागरत्ना ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक समीक्षा न्यायिक स्वतंत्रता द्वारा समर्थित होनी चाहिए। न्यायिक समीक्षा में अक्सर अदालतों को कानून को अमान्य घोषित करना, कार्यपालिका की कार्रवाई पर रोक लगाना या यहां तक कि राजनीतिक बहुमत द्वारा पारित संवैधानिक संशोधनों को रद्द करना पड़ता है। जस्टिस नागरत्ना के अनुसार, ये आसान काम नहीं हैं। इनके अक्सर राजनीतिक परिणाम होते हैं। भले ही न्यायाधीश जानते हों कि अलोकप्रिय निर्णयों के कारण उनकी पदोन्नति, कार्यकाल विस्तार या सत्ताधारियों की नजरों में उनकी नाराजगी हो सकती है, फिर भी यह उनके निर्णयों में बाधा नहीं बननी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने एडीएम जबलपुर मामले में जस्टिस एचआर खन्ना के एकल असहमति वाले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने आपातकाल के दौरान व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद खोने की कीमत भी चुकानी पड़ी थी। जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि यदि न्यायाधीश अपनी न्यायिक समीक्षा शक्तियों का प्रयोग ‘सावधानीपूर्वक, चुनिंदा रूप से या बिल्कुल भी नहीं’ करते हैं, तो न्यायिक जवाबदेही प्रभावित होगी।
जस्टिस नागरत्ना के मुताबिक, आखिर में प्रत्येक न्यायाधीश का दृढ़ विश्वास, साहस और स्वतंत्रता ही मायने रखती है. न्यायाधीश होने के नाते, हमें हमेशा अपने पद की शपथ का पालन करना चाहिए, जो हमारा न्यायिक धर्म है, और अपने करिअर पर इसके परिणामों की परवाह किए बिना इसे निभाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस ने इस बात पर जोर दिया कि कार्यकाल की सुरक्षा न्यायाधीशों को प्रतिशोध से बचाती है। उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की पारदर्शी और सुव्यवस्थित नियुक्ति प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण प्रभाव को कम करती है, जबकि प्रशासनिक और वित्तीय दोनों प्रकार की संस्थागत स्वायत्तता अप्रत्यक्ष दबाव को रोकती है। जस्टिस नागरत्ना ने आगे कहा कि ये सुरक्षा उपाय न्यायाधीशों को त्रुटिहीन नहीं बनाते, लेकिन ये सिद्धांतों पर आधारित न्यायनिर्णय को संभव बनाते हैं।





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