




2026-09-19 16:03:30
बहुजन स्वाभिमान, डेस्क
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां पर जनता द्वारा चुना गया जनता का प्रधानमंत्री होता है। लेकिन 2014 के बाद से यहां की जनता को लगता है कि उनका प्रधानमंत्री उनका ना होकर व्यापारी मित्रों और हुडंदंगी आरएसएस का प्रधानमंत्री है। भारत में प्रजातंत्र है, प्रजातंत्र में जनता ही देश की मालिक होती है चूंकि जनता द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही देश के प्रधानमंत्री को चुनते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से देश का प्रधानमंत्री जनता के लिए जवाबदेह होता है। परंतु 2014 के बाद से संघियों द्वारा एक ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया गया है जो किसी भी प्रकार से जनता के लिए शुभ नहीं है। 2002 के बाद से देश में जितने भी साम्प्रदायिक दंगे किये गये तथा यहां के नागरिकों के बीच नफरत पैदा की गई उसमें स्वयं सेवक संघ और मोदी का सीधा संबंध रहा है। चाहे वे मुख्यमंत्री रहें हों या वर्तमान के प्रधानमंत्री। इस देश को जनता के प्रधानमंत्री की जरूरत है, यशस्वी प्रधानमंत्री की नहीं। गुलाम मानसिकता के संघी और भाजपाई कार्यकर्ता मोदी को यशस्वी प्रधानमंत्री कहकर देश को कलंकित कर रहे हैं और जनतंत्र का अपमान कर रहे हैं।
जन्मदिन मनाना हर व्यक्ति का निजी अधिकार हो सकता है, लेकिन जब कोई सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति अपने राजनीतिक दल और प्रशासनिक तंत्र के जरिए एक राष्ट्रीय तमाशा खड़ा करता है, तो देश उससे जवाब माँगेगा। सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के जन्मदिन पर नदियों के घाटों, मंदिरों और चौराहों पर शुद्ध घी के लाखों दीये जलाना किसी आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि उस गहरी सामाजिक और राजनीतिक संवेदनहीनता का दस्तावेज है जो आज भारत की जमीनी हकीकत बन चुकी है। यह सवाल महज एक दिन के आयोजन का नहीं है; यह सवाल उस सोच का है जो जनता की बदहाली, भुखमरी, सामाजिक विभाजन और संस्थागत विनाश के मलबे पर खड़े होकर अपने लिए जयघोष और जयकारों की उम्मीद करती है। आधुनिक संसदीय लोकतंत्र में सरकार का मुखिया प्रथम सेवक या जन-प्रतिनिधि होता है, कोई सामंती राजा या अवतार नहीं। लेकिन पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति को योजनाबद्ध तरीके से व्यक्ति-पूजा में तब्दील कर दिया गया है। ताली, थाली, दीये और फूलों की बारिश—यह वह भाषा है जिसका इस्तेमाल जनता का ध्यान बुनियादी सवालों से भटकाने के लिए किया जाता रहा है। जब देश अस्पतालों में बेड, वेंटिलेटर और आॅक्सीजन की कमी से कराह रहा था, तब भी दीये जलवाए गए थे; और आज जब देश बुनियादी आर्थिक संकटों से घिर चुका है, तब भी दीयों की कतारों से सब कुछ ठीक है का भ्रम रचा जा रहा है। इस तमाशाई व्यवस्था में सवाल पूछना देशद्रोह जैसा बना दिया गया है। यदि कोई नागरिक पूछे कि जिस घी से दीये जलाए जा रहे हैं, क्या उसी देश में करोड़ों बच्चों को दूध और पोषण मयस्सर है, तो उस नागरिक को व्यवस्था-विरोधी ठहरा दिया जाता है। यह लोकतांत्रिक चेतना को कुचलकर जनता को मूक दर्शक बनाने की प्रवृत्ति है। सरकार वैश्विक मंचों पर भारत को विश्वगुरु और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था घोषित करती है, लेकिन घरेलू सच्चाई सरकारी कागजों में ही दर्ज है।
मुफ्त राशन की लाचारी: देश की 140 करोड़ की आबादी में से 80 करोड़ से अधिक लोग हर महीने 5 किलो सरकारी अनाज पर निर्भर हैं। सत्ता इसे अपनी जनकल्याणकारी नीति बताती है, जबकि हकीकत में यह इस बात का प्रमाण है कि देश की आधी से अधिक आबादी अपने दम पर दो वक्त का संतुलित भोजन जुटाने में अक्षम बना दी गई है।
कुपोषण की भयावहता: ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति लगातार चिंताजनक बनी रही है, जिसे सरकार यह कहकर खारिज कर देती है कि यह देश को बदनाम करने की साजिश है। परंतु राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े भी यही गवाही देते हैं कि देश के एक-तिहाई से अधिक बच्चे नाटेपन और खून की कमी (एनीमिया) से जूझ रहे हैं। जहाँ गरीब माँ अपने बच्चे की थाली में दाल और तेल की बूँदें कम करने पर मजबूर है, वहाँ जन्मदिन के उत्सव में क्विंटलों घी का धुआँ उड़ा देना किसी भी संवेदनशील समाज के लिए उत्सव नहीं, बल्कि एक त्रासद विरोधाभास है।
दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का दमन: दीपक ज्ञान, सुरक्षा और समता का प्रतीक होता है, किंतु वर्तमान शासन में हाशिए के समाजों पर जो गुजर रही है, वह किसी गहरे अंधकार से कम नहीं है। दलितों पर संस्थागत और सामाजिक हमले: देश के विभिन्न हिस्सों में दलित युवकों को मूँछ रखने, घोड़ी चढ़ने या पानी के मटके को छूने भर से पीट-पीटकर मार दिया जाता है। हाथरस कांड में जिस तरह से रात के अंधेरे में प्रशासन ने बिना परिजनों की मौजूदगी के पीड़िता की चिता जलाई, वह इस व्यवस्था की संवेदनहीनता का चरम बिंदु था। विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी पैतृक जमीनों से बेदखल कर कॉपोर्रेट घरानों को जंगल सौंपे जा रहे हैं। हसदेव के जंगलों की कटाई इसका साक्षात प्रमाण है। विरोध करने वाले आदिवासियों को जेलों में ठूँसा जाता है, और सत्ता मंचों से उन्हें मात्र वोट बैंक की तरह भुनाती है। संविधान और अदालतों को दरकिनार कर बुलडोजर संस्कृति को प्रशासनिक वीरता के रूप में प्रचारित किया गया। अल्पसंख्यकों के घरों, दुकानों और इबादतगाहों को निशाना बनाना, उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कराना आज की सत्ता की ध्रुवीकरण की राजनीति का मुख्य हथियार बन चुका है।
नारी सुरक्षा का खोखला ढोंग: सत्ता का सबसे बड़ा पाखंड नारी शक्ति और बेटी बचाओ के नारों में झलकता है। विज्ञापनों में महिलाओं को सर्वोच्च सम्मान देने का दावा करने वाली सरकार का जमीनी रिकॉर्ड बेहद चिंताजनक है। महीनों तक जलते हुए मणिपुर में महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया गया, सामूहिक बलात्कार हुए, और पूरा राज्य जातीय हिंसा की आग में झोंक दिया गया। देश के प्रधानमंत्री महीनों तक मौन साधे रहे और संसद में मात्र कुछ सेकंड की औपचारिकता निभाकर कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। कठुआ, उन्नाव से लेकर बिलकिस बानो के बलात्कारियों और हत्यारों की समय से पूर्व रिहाई और जेल से बाहर आने पर उनका माल्यार्पण—यह दृश्य इस बात के गवाह हैं कि सत्ता की प्राथमिकता न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ है। देश का मान बढ़ाने वाली अंतर्राष्ट्रीय महिला पहलवानों को जब सड़कों पर घसीटा गया, जब वे अपने ही खेल महासंघ के ताकतवर अध्यक्ष के खिलाफ न्याय माँगते हुए रो रही थीं, तब सत्ता अपने रसूखदार नेता को बचाने में व्यस्त थी। ऐसे दौर में दीप प्रज्वलन केवल ढोंग का विस्तार ही है।
युवा, बेरोजगारी और तबाह होते भविष्य की चीखें: देश की 65% आबादी युवा है, लेकिन यही युवा आज सबसे अधिक ठगा हुआ, हताश और दिशाहीन महसूस कर रहा है। नीट, यूजीसी, नेट से लेकर विभिन्न राज्यों की पुलिस, शिक्षक और लिपिक भर्ती परीक्षाओं के पेपर खुलेआम बिक रहे हैं। लाखों छात्र जो सालों तक कमरों में बंद होकर, पेट काटकर तैयारी करते हैं, उनका भविष्य चंद भ्रष्ट अधिकारियों और माफियाओं के हाथों नीलाम हो जाता है। सेना, जो ग्रामीण और गरीब युवाओं के लिए सम्मान और स्थायी रोजगार का जरिया थी, उसे चार साल के ठेके में बदल दिया गया। पेंशन खत्म कर दी गई और युवाओं को असमंजस के भंवर में छोड़ दिया गया। पढ़े-लिखे इंजीनियर, परास्नातक युवा आज 10-12 घंटे मोटरसाइकिल चलाकर डिलीवरी ब्वॉय बनने को मजबूर हैं। इसे सरकार स्टार्ट-अप और आत्मनिर्भरता का नाम देकर अपनी नाकामियों पर पर्दा डालती है।
मित्र काल में जनता की जेब पर डाका: यह सरकार गरीबों के नाम पर सत्ता में आई, लेकिन इसकी आर्थिक नीतियां केवल मुट्ठी भर कॉपोर्रेट घरानों की तिजोरियाँ भरने के लिए समर्पित दिखाई देती हैं। हवाई अड्डे, बंदरगाह, रेलवे, टेलीकॉम, सौर ऊर्जा और खदानें—देश की तमाम सार्वजनिक संपत्तियाँ एक-दो खास उद्योगपतियों के हवाले कर दी गईं। कॉपोर्रेट टैक्स को घटाकर 22% कर दिया गया और उद्योगपतियों के लाखों करोड़ के कर्ज बट्टे खाते में डाल दिए गए। इसके विपरीत, आम नागरिक के दूध, दही, आटा, पढ़ाई की कॉपियों और कफन तक पर जीएसटी की मार थोप दी गई। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस पर लगने वाले भारी एक्साइज ड्यूटी ने आम परिवार की कमर तोड़ दी है। 800 से 1100 रुपये का सिलेंडर देकर महिलाओं को धुएँ से मुक्ति दिलाने का दावा केवल होर्डिंग्स में जिÞंदा है; ग्रामीण इलाकों में चूल्हे फिर से लकड़ी और कंडे के धुएँ से सुलग रहे हैं।
अघोषित आपातकाल: एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान उसकी स्वतंत्र संस्थाओं से होती है, लेकिन आज भारत की लगभग सभी स्वायत्त संस्थाएँ सत्ता के अधीन नजर आती हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), सीबीआइ्र और आयकर विभाग निष्पक्ष जांच एजेंसियां न रहकर विपक्ष को तोड़ने, सरकारों को गिराने और उद्योगपतियों को डराने का राजनीतिक औजार बन चुकी हैं। जो नेता विपक्ष में रहकर भ्रष्टाचारी था, वह सत्ताधारी दल में शामिल होते ही बेदाग हो जाता है। मुख्यधारा की मीडिया का बड़ा हिस्सा पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों को ताक पर रखकर केवल सत्ता की स्तुति और सांप्रदायिक नफरत फैलाने का काम कर रहा है। टीवी चैनलों पर जनता के बुनियादी मुद्दों पर बहस नहीं होती, बल्कि केवल प्रधानमंत्री की वेशभूषा, उनके भाषणों और विपक्ष को नीचा दिखाने का तमाशा चलता है। लोकतंत्र के इतिहास में यह अकेला ऐसा दौर है जहाँ देश के मुखिया ने अपने दस से अधिक वर्षों के कार्यकाल में एक भी खुली, निष्पक्ष प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का साहस नहीं दिखाया। टेलीप्रॉम्प्टर और स्क्रिप्टेड साक्षात्कारों के पीछे छिपने वाली यह व्यवस्था जनता के सीधे सवालों से घबराती है।
विज्ञान और तर्क पर हमला: उत्सवों और अंधविश्वास की इस राजनीति ने देश के वैज्ञानिक मिजाज और ऐतिहासिक चेतना को भी गहरा नुकसान पहुँचाया है। विश्वविद्यालयों को वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा बना दिया गया है। शोध और उच्च शिक्षा के बजट में कटौती की जा रही है, जबकि अवैज्ञानिक दावों, पौराणिक कल्पनाओं को इतिहास और विज्ञान बनाकर पेश किया जा रहा है। बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकतार्ओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकतार्ओं को बिना ट्रायल के वर्षों तक जेलों में बंद रखना (जैसे भीमा कोरेगांव मामला या यूएपीए का दुरुपयोग) यह दर्शाता है कि यह सत्ता किसी भी स्वतंत्र आवाज को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है।
यह जश्न जनता का नहीं, सत्ता के अहंकार का है: वडनगर से वाराणसी तक निकली बाइक रैली महज एक खबर नहीं है; यह एक आईना है जिसमें भारत के लोकतंत्र की मौजूदा लाचारी साफ देखी जा सकती है। जब देश की एक बहुत बड़ी आबादी अपने अस्तित्व की बुनियादी लड़ाई लड़ रही हो, तब सत्ता के गलियारों से लेकर सड़कों तक ऐसा अंधा जश्न मनाना जनता के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। वडनगर से वाराणसी तक की सड़कों पर जलने वाला पेट्रोल और लहराते हुए झंडे देश के विकास की गवाही नहीं देते। वे गवाही देते हैं उस राजनीतिक पाखंड की, जो जनता के आंसुओं, खाली थालियों और बुझते हुए चूल्हों के धुएं पर अपने प्रचार की भव्य मीनारें खड़ी कर रहा है। इतिहास कभी न कभी इस बात का हिसाब जरूर माँगेगा कि जब मुल्क बुनियादी संकटों से कराह रहा था, तब देश के रहनुमा किस बात का जश्न मना रहे थे। ये दीये जला रहे थे। ये जलते हुए दीये देश की समृद्धि की निशानी नहीं हैं। ये दीये उस किसान के आँसुओं का उपहास हैं जो दिल्ली की सीमाओं पर अपनी जान देकर भी एमएसपी की गारंटी न पा सका। ये दीये उन युवाओं के भविष्य के साथ मजाक हैं जो पेपर लीक के बाद लाठियों से पीटे गए। ये दीये उन दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के घरों के मलबे पर जलाए गए हैं जिन पर बुलडोजर चलाए गए। इतिहास गवाह है कि कोई भी सत्ता केवल पीआर, विज्ञापनों और दीपोत्सवों के सहारे अपनी विफलताएँ हमेशा के लिए नहीं छुपा सकती। जब चूल्हे बुझते हैं, जब बच्चों के पेट खाली होते हैं, जब न्याय की उम्मीदें टूटती हैं, तो उठने वाला धुआँ एक दिन इन कृत्रिम दीयों की पूरी रोशनी को लील जाता है। यह दीयों की रोशनी नहीं है; यह सत्ता के दंभ का प्रदर्शन और उन लाखों-करोड़ों बुझे हुए घरों के धुएँ को ढंकने की एक बेहद कमजोर और नाकाम कोशिश है। जनता का दर्द जब सीमा पार कर जाता है, तब तमाशों के ये दीपक अंधेरे को मिटाने के काम नहीं आते, बल्कि सत्ता के पतन की घोषणा बन जाते हैं।





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