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जब तक महिलाएं सशक्त नहीं होंगी बहुजन समाज आगे नहीं बढ़ सकता

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2026-11-07 17:32:28

सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा के लिए बहुजन समाज का संघर्ष सदियों पुराना है। ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, पेरियार ई.वी. रामासामी और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे विचारकों ने जिस सामाजिक क्रांति की नींव रखी, उसका ध्येय केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व हासिल करना नहीं था, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का संपूर्ण बौद्धिक, मानसिक, आर्थिक और नैतिक उत्थान करना था। बाबासाहेब आंबेडकर ने शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो का नारा देकर समाज को चेतना के नए शिखर पर पहुँचाया। इस ऐतिहासिक यात्रा में जब आज बहुजन समाज की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है, तो दो प्रमुख आंतरिक बाधाएँ स्पष्ट रूप से उभरती हैं। पहली, पुरुषों में नशे (विशेषकर शराब और अन्य मादक पदार्थों) का बढ़ता प्रसार। और दूसरी, निर्णय लेने की प्रक्रियाओं, सामाजिक नेतृत्व और घरेलू वित्तीय नियंत्रण में महिलाओं की उपेक्षा। यह निर्विवाद सत्य है कि जब तक समाज के भीतर ऊर्जा और संसाधनों का क्षरण करने वाले व्यसनों पर रोक नहीं लगेगी और जब तक समाज की आधी आबादी—महिलाओं—को घर से लेकर सार्वजनिक जीवन तक नेतृत्व की लगाम नहीं सौंपी जाएगी, तब तक वास्तविक सामाजिक परिवर्तन अधूरा रहेगा।

बहुजन चेतना का इतिहास गवाह है कि सभी प्रमुख समाज सुधारकों ने व्यसन-मुक्ति और स्त्री-सशक्तिकरण को सामाजिक मुक्ति की पहली शर्त माना। 1927 के महाड़ सत्याग्रह और 1942 के नागपुर महिला सम्मेलन में बाबासाहेब ने महिलाओं को संबोधित करते हुए स्पष्ट कहा था कि पुरुषों की मद्यपान की लत के खिलाफ महिलाओं को सबसे पहले मोर्चा खोलना चाहिए। उन्होंने कहा था ‘यदि आपके पति या पुत्र शराब पीते हैं, तो उन्हें घर में खाना मत दो। अपने आत्मसम्मान को पहचानो। जब तक घर की महिलाएं सशक्त नहीं होंगी, समाज आगे नहीं बढ़ सकता।’ वहीं सत्यशोधक समाज के माध्यम से सावित्रीबाई फुले ने कुरीतियों, अंधविश्वास और नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने शिक्षा को मुक्ति का माध्यम बनाया और महिलाओं को समाज के नेतृत्व की धुरी माना। उधर, तमिलनाडु में पेरियार ने शराबबंदी और विवाह संस्था में महिलाओं की पूर्ण बराबरी की वकालत की। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुरुष प्रधान समाज में नशाखोरी महिलाओं पर अत्याचार का सबसे बड़ा साधन बनती है। इन महापुरुषों का विचार था कि बाहरी शोषण (ब्राह्मणवाद और सामंतवाद) से लड़ने से पहले समाज को अपनी आंतरिक कमजोरियों (अशिक्षा, व्यसन और पितृसत्ता) को समाप्त करना होगा। नशा केवल एक व्यक्तिगत बुराई नहीं है; यह बहुजन बस्तियों में एक सुनियोजित संरचनात्मक संकट का रूप ले चुका है। जब एक श्रमिक या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार का पुरुष शराब, गांजा या अन्य नशीले पदार्थों की चपेट में आता है, तो उसका प्रभाव संपूर्ण समुदाय पर पड़ता है।

सीमित संसाधनों की बर्बादी: बहुजन समाज का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र, दैनिक मजदूरी, गिग इकॉनमी और छोटे व्यवसायों में कार्यरत है। दिनभर की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद अर्जित कमाई का 30 से 50 प्रतिशत हिस्सा शराब और गुटखे की दुकानों पर चला जाता है।

कर्ज का दुष्चक्र: नशे के कारण जब घरेलू खर्च, बच्चों की स्कूल फीस या स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें पूरी नहीं होतीं, तो परिवार स्थानीय साहूकारों या माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से अत्यधिक ब्याज दरों पर कर्ज लेने को विवश हो जाता है। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली आर्थिक गुलामी का कारण बनता है।

पूंजी निर्माण में बाधा: जो धन बच्चों की उच्च शिक्षा, व्यावसायिक कौशल या बचत में लगना चाहिए था, वह धुएं और शराब में विलीन हो जाता है। इससे समाज में आर्थिक पूंजी का निर्माण नहीं हो पाता।

औसत आयु में कमी: अत्यधिक मद्यपान के कारण लिवर सिरोसिस, हृदय रोग, कैंसर और मानसिक अवसाद बहुजन बस्तियों में आम हैं। 30 से 45 वर्ष की उत्पादक आयु में पुरुषों की असामयिक मृत्यु के कारण अनगिनत महिलाएं कम उम्र में विधवा हो जाती हैं और बच्चे अनाथ।

बौद्धिक जड़ता: नशा मनुष्य की तर्कशक्ति, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक चेतना को समाप्त कर देता है। एक नशेड़ी व्यक्ति अपने संवैधानिक अधिकारों या सामाजिक आंदोलनों के बारे में सोचने में असमर्थ हो जाता है।

घरेलू हिंसा और सामाजिक पतन: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े लगातार यह दशार्ते हैं कि घरेलू हिंसा की घटनाओं का सीधा संबंध शराब के उपभोग से है। नशे की हालत में घर लौटने वाले पुरुष अपनी पत्नियों और बच्चों पर शारीरिक व मानसिक अत्याचार करते हैं। इससे बच्चों के मन पर गहरा आघात लगता है, वे भय के माहौल में पलते हैं और शिक्षा से दूर होकर अपराध या उसी व्यसन की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं।

राजनीतिक चेतना का भटकाव: लोकतंत्र में बहुजन समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका मताधिकार था, जिसे बाबासाहेब ने राजनीतिक शक्ति की कुंजी बताया था। विडंबना यह है कि चुनावी राजनीति में नशे को बहुजन वोटों को निष्क्रिय करने का हथियार बना लिया गया है। चुनावों के दौरान बस्तियों में शराब की पेटियां बांटकर नीतिगत मुद्दों, शिक्षा, रोजगार और अस्पताल की मांगों को दरकिनार कर दिया जाता है। जब युवा पीढ़ी नशे में लिप्त होती है, तो वह सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव या बेरोजगारी के खिलाफ एकजुट होकर सड़कों पर उतरने की ऊर्जा खो देती है। राजनीतिक दल इस स्थिति का लाभ उठाकर समुदाय को केवल एक वोट बैंक बनाकर रखते हैं।

महिलाओं के हाथों में लगाम: क्यों और कैसे? जब हम कहते हैं कि ‘लगाम महिलाओं को देनी होगी’, तो इसका अर्थ केवल प्रतीकात्मक सम्मान नहीं, बल्कि वित्तीय नियंत्रण, घरेलू निर्णय-प्रक्रिया और सामाजिक-राजनीतिक नेतृत्व में महिलाओं की सर्वोच्च भूमिका सुनिश्चित करना है। अनुभव और समाजशास्त्रीय अध्ययन सिद्ध करते हैं कि जब परिवार के वित्त की कमान महिला के हाथ में होती है, तो खर्च की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। पैसा पहले पौष्टिक भोजन, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और बचत में जाता है, न कि व्यसनों में। देश भर में स्वयं सहायता समूहों के अनुभवों ने दिखाया है कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी बहुजन महिलाएं छोटे-छोटे बचत मॉडल से न केवल अपने परिवारों को गरीबी से बाहर निकाल रही हैं, बल्कि साहूकारों के चंगुल से भी मुक्त करा रही हैं। एक शिक्षित और सशक्त मां अपने बच्चों को जातिगत हीनभावना से निकालकर आत्मविश्वास से भरती है। माता सावित्रीबाई फुले का जीवन इसका साक्षात उदाहरण है। जब महिला के पास अधिकार होते हैं, तो वह पहली फुर्सत में बच्चों को स्कूल भेजती है और यह सुनिश्चित करती है कि वे ड्रॉपआउट न हों। शराब और नशे का सबसे पहला और भीषण शिकार महिलाएं होती हैं। इसलिए नशामुक्ति का कोई भी सरकारी या सामाजिक आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक उसकी कमान महिलाओं के हाथ में न हो। आंध्र प्रदेश में 1990 के दशक का ऐतिहासिक शराब-विरोधी आंदोलन महिलाओं की अगुवाई में ही चला था, जिसने राज्य सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था।

पितृसत्ता और बहुजन समाज: बहुजन विमर्श अक्सर बाहरी जातिवादी संरचनाओं की आलोचना तो करता है, लेकिन समाज के भीतर मौजूद पितृसत्तात्मक कुरीतियों पर मौन साध लेता है। यह एक गंभीर विरोधाभास है। हम समाज में समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की मांग करते हैं, लेकिन क्या वही समानता हमारे घरों के भीतर अपनी माताओं, बहनों और पत्नियों को उपलब्ध है? यदि घर में पुरुष का व्यवहार निरंकुश और शोषक है, तो हम बाहर समानता की नैतिक लड़ाई कैसे लड़ सकते हैं? बहुजन राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और धार्मिक मंचों पर मंच संचालन से लेकर नीति-निर्माण तक पुरुषों का वर्चस्व दिखता है। महिलाओं को केवल रैलियों में भीड़ जुटाने या सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सीमित कर दिया जाता है। यह स्थिति बदलनी चाहिए।

क्या कदम उठाए जाएं? बहुजन समाज के वास्तविक उद्धार के लिए निम्नलिखित ठोस और व्यावहारिक कदमों को प्राथमिकता के आधार पर लागू करना होगा। बहुजन मोहल्लों और गांवों में महिलाओं की अगुवाई वाली सुरक्षा कमेटियां गठित की जाएं, जो अवैध शराब की बिक्री और जुए के अड्डों पर रोक लगाएं। जो व्यक्ति नशे में धुत होकर घरेलू हिंसा करता है, उसे सामाजिक मंचों, विवाह आयोजनों और पंचायतों में तब तक कोई स्थान न दिया जाए जब तक वह सुधार न करे। घर की आय सीधे महिला के बैंक खाते में जमा हो। सरकार की योजनाओं (जैसे डीबीटी) की तरह ही परिवारों को यह नियम बनाना चाहिए कि बचत और दैनिक खर्च का अधिकार महिला के पास रहे। संपत्ति (मकान, जमीन, दुकान) का पंजीकरण अनिवार्य रूप से महिला के नाम पर या संयुक्त रूप से कराया जाए। बहुजन विचार पर आधारित संगठनों, ट्रस्टों और राजनीतिक दलों में 50 प्रतिशत पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए जाएं। उन्हें केवल महिला विंग में न रखा जाए, बल्कि मुख्य निर्णय लेने वाली समितियों में अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष बनाया जाए। स्थानीय स्तर पर महिला वक्ताओं, विचारकों और कार्यकतार्ओं को तैयार करने के लिए बौद्धिक प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित की जाएं। युवा लड़कों को बचपन से ही यह सिखाया जाए कि पौरुष का अर्थ शराब पीना, आक्रामकता दिखाना या महिलाओं पर हुक्म चलाना नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी, बौद्धिक विवेक और समानता का आचरण करना है। फुले-आंबेडकर साहित्य का अध्ययन केवल रस्म अदायगी न रहे; उसके नैतिक और व्यावहारिक पक्ष को जीवनशैली का हिस्सा बनाया जाए।

निष्कर्ष: बहुजन समाज का उद्धार किसी बाहरी मसीहा की दया पर निर्भर नहीं है। यह समाज के भीतर आत्म-सुधार और आत्म-मूल्यांकन से ही संभव होगा। नशे की लत ने इस समाज के लाखों नौजवानों की ऊर्जा, प्रतिभा और क्रांति की भावना को लील लिया है। यह एक ऐसा धीमा जहर है जो बहुजन राजनीति और सामाजिक आंदोलन की धार को कुंद कर रहा है। दूसरी ओर, बहुजन महिलाएं असीम धैर्य, श्रम और नेतृत्व क्षमता की धनी हैं। उन्होंने सदियों से अभावों के बीच भी परिवारों को संभालकर रखा है। यदि इस शक्ति को केवल रसोई तक सीमित न रखकर समाज और परिवार के संचालन की बागडोर सौंप दी जाए, तो बहुजन समाज की प्रगति की गति कई गुना बढ़ जाएगी। अब समय आ गया है कि बहुजन पुरुष अपनी कमजोरियों को स्वीकार करें, नशे की बोतलों को त्यागें और अपनी बहनों, पत्नियों और माताओं के हाथों में निर्णय की शक्ति सौंपें। समानता केवल संसद या संविधान में मांगने की वस्तु नहीं है, इसे अपने घर और आंगन में उतारना होगा। जिस दिन बहुजन बस्तियां नशे से मुक्त होंगी और उन बस्तियों की अगुवाई जागरूक, शिक्षित महिलाएं करेंगी, उसी दिन डॉ. आंबेडकर का प्रबुद्ध भारत का सपना वास्तविक रूप से साकार होगा।

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02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

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06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

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29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

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