Sunday, 6th September 2026
Follow us on
Sunday, 6th September 2026
Follow us on

जातिवाद व सामंतवाद का समूल नाश सामाजिक सौहार्द के लिए आवश्यक

सुश्री फूलन देवी और श्रीराम जी का रास्ता ही न्यायिक
News

2026-09-05 15:07:36

भारत में जातिवाद और सामंतवाद की जड़े गहराई तक व्याप्त है। अतीत से लेकर वर्तमान तक जातिवाद और सामंतवाद हर सरकार में मजबूत ही हुआ है। किसी भी सरकार में वह कमजोर नहीं हुआ। वर्तमान में यह सत्ता बल के संरक्षण में पलकर तेजी से बढ़ा है। वर्तमान में ब्राह्मणवादी संघी शासन है, जिसका इको सिस्टम इन दोनों मानसिकताओं को अधिक खाद-पानी देकर शक्तिशाली बना रहा है। भारत का बहुजन जागरूक समाज इन दोनों मानसिकताओं को भलीभांति समझता है। भारतीय समाज में जो जातीय समूह अत्यंत वंचित और शोषित है, उन्हीं का दमन व शोषण इसी प्रकार की मानसिकता वालों के द्वारा अधिक किया गया है। भारत के दलित-शोषित व वंचित समाज ने अपने ऊपर अत्याचार की पराकाष्ठा को झेला, उस दर्द को महसूस किया है। लेकिन जब किसी भी चीज की अति हो जाती है तो ऐसे घिनौने अत्याचार के विरुद्ध कुछेक साहसी और निडर व्यक्ति अपनी जान की परवाह किये बगैर उसके विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। देशभर में ऐसी मिशाले तो बहुत है परंतु उत्तर भारत के क्षेत्र में दो नाम प्रमुखता से लिए जाते है, जिनपर बहुजन समाज गर्व करता है। ये प्रमुख नाम है सुश्री फूलन देवी जी और श्री श्रीराम जाटव जी। जिन्होंने वंचित और शोषित समाज के ऊपर एकतरफा अत्याचार के विरुद्ध समाज की जातिवादी व सामंतवादी अत्याचार से मुक्ति का शंखनाद फूंका और बदले में कठोर कारावास और सरकारी यातनाएं भी झेली। ये दोनों बहुजन समाज के प्रेरणा स्रोत हैं।

फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के एक गाँव में 1963 में हुआ था। 16 वर्ष की उम्र में सवर्ण समाज के डाकुओं ने उनका अपहरण कर उनके साथ बलात्कार किया था। उसके बाद ही उनके सामने बदला देने के लिए डाकू बनने का रास्ता बना। उन्होंने 14 फरवरी 1981 को बहमई में 22 ठाकुरों की हत्या कर दी थी। इस घटना ने फूलन देवी का नाम हर बच्चे की जुबान पर ला दिया था। फूलन देवी का कहना था कि ठाकुरों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया था जिसका बदला लेने के लिए ही उन्होंने ये हत्याएं कीं। फूलन 1998 का लोकसभा चुनाव हार गईं लेकिन अगले ही साल हुए 13वीं लोकसभा के चुनाव में वे फिर जीत गईं। 25 जुलाई 2001 को उनकी हत्या कर दी गई। 80 के दशक में फूलन देवी का नाम फिल्म शोले के गब्बर सिंह से भी ज्यादा खतरनाक और चर्चित बन चुका था। कुछ महिलाओं को फूलन देवी की धमकी और मिसाल देते अक्सर सुना जाता था। कहा जाता था कि फूलन देवी का निशाना बड़ा अचूक था और उससे भी ज्यादा कठोर था उनका दिल। जानकारों का कहना है कि हालात ने ही फूलन देवी को कठोर बना दिया कि जब उन्होंने बहमई में एक लाइन में खड़ा करके 22 ठाकुरों की हत्या की तो उन्हें जरा भी मलाल नहीं हुआ। फूलन देवी 1980 के दशक के शुरूआत में चंबल के बीहड़ों में सबसे खतरनाक डाकू मानी जाती थीं। उनके जीवन पर कई फिल्में भी बनीं।

फूलन देवी को शक था कि उत्तर प्रदेश पुलिस उन्हें समर्पण के बाद किसी ना किसी तरीके से मार देगी इसलिए उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के सामने हथियार डालने के लिए सौदेबाजी की। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने फूलन देवी ने एक समारोह में हथियार डाले और उस समय उनकी एक झलक पाने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। उस समय फूलन देवी की लोकप्रियता किसी फिल्मी सितारे से कम नहीं थी। फूलन देवी के जीवन पर शेखर कपूर ने ‘बैंडिट क्वीन’ नाम से फिल्म बनाई फूलन देवी ने लाल रंग का कपड़ा माथे पर बाँधा हुआ था और हाथ में बंदूक लिए जब वे मंच की तरफ बढ़ीं थीं तो सबकी साँसें जैसे थम सी गई थीं। कहीं फूलन यहाँ भी तो गोली नहीं चला देगी और कुछ ही लम्हों में फूलन देवी ने अपनी बंदूक माथे पर छुआकर फिर उसे अर्जुन सिंह के पैरों में रख दिया। इसी घड़ी फूलन देवी ने डाकू की जिंदगी को अलविदा कह दिया था। फूलन देवी ने 1983 में आत्मसमर्पण किया और 1994 तक जेल में रहीं। इस दौरान कभी भी उन्हें उत्तर प्रदेश की जेल में नहीं भेजा गया। 1994 में जेल से रिहा होने के बाद वे 1996 में वे 11वीं लोकसभा के लिए मिर्ज़ापुर से सांसद चुनी गईं।

श्रीराम जाटव : इंसान की जिंदगी के 30 वर्ष कितने महत्वपूर्ण होते हैं, इसे उस व्यक्ति और उसके परिवार की आंखों से समझा जा सकता है। जो जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्षों का एक बड़ा हिस्सा है यदि यह सलाखों के पीछे बीत जाए तो उस पीड़ा को शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। श्रीराम जाटव की करीब 30 वर्षों के लंबे कारावास के बाद हुई, रिहाई को उनके समर्थक केवल एक व्यक्ति की आजादी नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक संघर्ष की निर्णायक जीत के रूप में देख रहे हैं। सोशल मीडिया पोस्टों में भी श्रीराम जाटव की रिहाई को लेकर बधाइयां दी जा रही हैं और उनके मेरठ पहुंचने की जानकारी साझा की गई है। श्रीराम जाटव के समर्थकों के लिए उनकी रिहाई केवल कानूनी प्रक्रिया का परिणाम नहीं है। उनके लिए यह एक संघर्ष का परिणाम है जो वर्षों तक चलता रहा। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक जेल में रहता है तो उसके साथ केवल एक व्यक्ति कैद नहीं होता। उसके साथ उसका परिवार भी एक तरह की सामाजिक और आर्थिक कैद में चला जाता है। घर की जिम्मेदारियां बदल जाती हैं। आर्थिक परिस्थितियां बदल जाती हैं। रिश्तों की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और सबसे बड़ी बात समय वापस नहीं आता। तीन दशक पहले जब श्रीराम जाटव जेल गए होंगे, आज वह दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। तकनीक बदल गई, राजनीति बदल गई, समाज बदल गया और लोगों के जीवन जीने के तरीके बदल गए। लेकिन जो 30 वर्ष बीत गए, वे वापस नहीं आ सकते।

मेरठ से उठने वाली आवाज: मेरठ का इतिहास सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक चेतना का रहा है। यह क्षेत्र हमेशा से उन आवाजों का केंद्र रहा है जो अपने अधिकार, सम्मान और स्वाभिमान के लिए संघर्ष करती रही हैं। श्रीराम जाटव की रिहाई से उन्हें संघर्ष और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। उनकी रिहाई के बाद मेरठ से लेकर पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रकरण की चर्चा तेज हो गई है। यह चर्चा केवल श्रीराम जाटव तक सीमित नहीं रह सकती। यह चर्चा उस पूरे समाज की है जो यह जानना चाहता है कि न्याय, सम्मान और अधिकार के लिए संघर्ष करना जातिवादी और सामंतवादी विचारधारा को समूल नष्ट करने की जरूरत की और इंगित करता है।

पुराने मुकदमों का सच भी सामने आना चाहिए: श्रीराम जाटव से जुड़े मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू न्याय के प्रश्न पर भावनाओं के साथ-साथ तथ्यों की भी उतनी ही आवश्यकता है। किसी व्यक्ति की रिहाई को उसके दोषमुक्त होने का प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं है, जब तक संबंधित न्यायालय का आदेश या आधिकारिक रिकॉर्ड ऐसा स्पष्ट रूप से न कहे। लेकिन इसी के साथ यह सवाल पूछना भी जरूरी है कि यदि किसी व्यक्ति ने तीन दशक जेल में बिताए हैं तो उसके मामले की पूरी कानूनी और सामाजिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक विमर्श में क्यों नहीं आनी चाहिए? भारतीय सामाजिक व्यवस्था में दलितों-पिछड़ों और आर्थिक रूप से कमजोर समाज को न्याय मिलना कठिन ही नहीं असंभव भी देखा गया है। एनसीआरबी के आंकड़े इसी पुष्टि करता है।

क्या समाज अपने संघर्षशील लोगों को भूल जाता है: यह सवाल हम सभी से है। क्या समाज उन लोगों को उनके संघर्ष को याद रखता है? श्रीराम जाटव की रिहाई हमें इस सवाल पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर करती है।

यदि तीन दशक तक कोई व्यक्ति सलाखों के पीछे रहा और उसका परिवार बाहर उसकी वापसी का इंतजार करता रहा, तो उस इंतजार की कीमत क्या थी? उस परिवार की सामाजिक स्थिति पर क्या असर पड़ा? उसकी आर्थिक स्थिति किस तरह बदली? उसकी अगली पीढ़ी ने क्या खोया? ये सवाल केवल भावनात्मक नहीं हैं। ये सामाजिक न्याय के सवाल हैं। समाज ने उनके संघर्ष में कितना साथ दिया यह महत्वपूर्ण प्रश्न है?

रिहाई के बाद शुरू होगा नया अध्याय: अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जेल से बाहर आने के बाद श्रीराम जाटव की अगली भूमिका क्या होगी? क्या वे सामाजिक जीवन में सक्रिय होंगे? क्या उनके तीन दशक लंबे अनुभवों पर कोई पुस्तक, दस्तावेज या सार्वजनिक विमर्श सामने आएगा? क्या समाज के जागरूक समर्थक इस रिहाई को व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप देंगे?

उनकी यह रिहाई एक ऐसे अध्याय को फिर से खोल चुकी है जिसे शायद समाज ने लंबे समय तक भुला दिया था। श्रीराम जाटव की कहानी को केवल एक व्यक्ति की जेल यात्रा के रूप में देखने के बजाय हमें इसे व्यापक सामाजिक संदर्भ में भी देखना चाहिए। किसी व्यक्ति के जीवन के 30 वर्ष उसकी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं होते। उसके साथ परिवार का भविष्य जुड़ा होता है। उसके साथ बच्चों की जिंदगी जुड़ी होती है। उसके साथ माता-पिता की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। उसके साथ सामाजिक संबंध जुड़े होते हैं। और जब वही व्यक्ति तीन दशक बाद समाज में वापस आता है तो उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है कि क्या वह उसी समाज में वापस लौटा है जिसे वह छोड़कर गया था? जवाब है-नहीं। दुनिया बदल चुकी है। लेकिन कुछ सवाल आज भी वही हैं।

सलाखों के पीछे स्वाभिमान तक: श्रीराम जाटव के समर्थक स्वाभिमान की जीत मान रहे हैं। यह संदेश है कि संघर्ष लंबा हो सकता है, रास्ता कठिन हो सकता है, परिस्थितियां विपरीत हो सकती हैं, लेकिन किसी व्यक्ति की कहानी को उसकी सजा, मुकदमे या जेल की चारदीवारी तक सीमित नहीं किया जा सकता। उसके पीछे भी एक परिवार और समाज होता है, एक इतिहास होता है।

अब समाज को मंथन करना होगा: समाज के लिए सबसे जरूरी है तथ्यों को सामने लाना; मामले की पूरी कानूनी की पृष्ठभूमि को सार्वजनिक करना। न्यायालय के आदेशों को सामने रखना। परिवार की वास्तविक स्थिति सामने आए। तीन दशक के कारावास की पूरी कहानी समाज जाने। और उसके बाद समाज स्वयं तय करे कि इस घटना को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए। क्योंकि न्याय केवल अदालतों में नहीं होता। न्याय समाज की स्मृति में भी होना चाहिए। और यदि किसी व्यक्ति ने जीवन के 30 वर्ष सलाखों के पीछे बिताए हैं, तो उसके जीवन की कहानी को समझना भी समाज की जिम्मेदारी है।

दमन और उत्पीड़न हिन्दुत्व की वैचारिकी से पैदा होता है: हिन्दुत्व की वैचारिकी भारतीय समाज में आरएसएस के जन्म से पहले ही मौजूद है। समाज में जितने भी दमन और उत्पीड़न के मामले घटित हुए हैं वे सभी मनुवादी ब्राह्मणवादी और हिन्दुत्व की वैचारिकी के कारण ही घटित हुए हैं। हिन्दुत्व की वैचारिकी सामाजिक सद्भाव, बराबरी, समानता और समता की दुश्मन है। यह ऐसी जहरीली व्यवस्था है जिसे भारत के दलित, शोषित-वंचित समाज करीब तीन हजार वर्षों से झेल रहे हैं, तीन हजार वर्षों के अमानवीय अत्याचार को सामने रखकर देखा जाये तो हर जागरूक व्यक्ति का शरीर काँप उठता है। दलित शोषित व वंचित समाज इससे कैसे निपटे? बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान में समतामूलक समाज की स्थापना के लिए संविधान में कई अनुच्छेद उत्पीड़ित समाज के संरक्षण के लिए बनाए, फिर भी समाज में ऐसे उत्पीड़न और अपराधों की कमी नहीं आई बल्कि उल्टे बढ़ोत्तरी हुई है, इसके लिए सटीक समाधान क्या हो सकता है?

ब्राह्मणवादी शोषण और उत्पीड़न का इलाज: पिछले तीन हजार वर्षों में बहुजन समाज ने जो देखा और सहा है, वह अकल्पनीय है। इसलिए ऐसे उत्पीड़न का समाधान भारतीय सामाजिक व्यवस्था में केवल आत्मसम्मान और आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाना ही अंतिम विकल्प रह जाता है। चूंकि उत्पीड़ित और शोषित समाज के लिए कोई संरक्षण देने वाला कानून नहीं है। भगवान बुद्ध जो विश्व में सबसे बड़े ज्ञानी और करुणामयी महमानव हुए है उन्होंने भी आत्मसम्मान और आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाने के लिए मना नहीं किया। आत्मसम्मान और आत्मरक्षा के लिए यथास्थिति के अनुसार हथियार उठाना मनुष्य के अपने जीवन के लिए वांछनीय है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने भी भारत के संविधान में आत्मसम्मान और आत्मरक्षा के लिए हथियार उठाने को अपराध नहीं माना है, इसलिए यहाँ निसंदेह कहा जा सकता है कि दलित शोषित व वंचित समाज को अगर न्यायालयों से किसी भी वजह से न्याय नहीं मिलता है तो उन्हें अपने सम्मान के लिए खुद ही लड़ना होगा और अपनेजीवन और अपनी संपत्ति की रक्षा करनी होगी। मौजूदा सरकारें देश में ऐसे ही माहौल को आमंत्रित कर रही है, आज जितने भी दलित शोषित वंचित समाज के ऊपर उत्पीड़न हो रहे हैं उनमें न्यायायलों से न्याय 2 प्रतिशत लोगों को भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसी सामाजिक व्यवस्था में सुश्री फूलन देवी और श्रीराम जी का रास्ता ही न्यायिक दिखाई देता है।

बहुजन समाज का दायित्व: फूलन देवी और श्रीराम जैसी घटनाओं को देखकर लगता है कि बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों को मिलकर अपने ऊपर हो रहे अत्याचार और उत्पीड़न को लेकर एक जीवंत व समृद्ध संगठन का निर्माण करना चाहिए। जिसका उद्देश्य और लक्ष्य बहुजन समाज के ऊपर हो रहे उत्पीड़न के निवारण के लिए यथासंभव योजनाओं का निर्माण करके उन्हें सभी सशक्त और जीवंत बनाना चाहिए। पिछले 5 हजार वर्षों के इतिहास को देखकर लगता है कि यहाँ कि भूमि पर जन्में व्यक्तियों की मानसिकता से ब्राह्मणवाद और सामंतवाद खत्म नहीं हो सकता। चूंकि यहाँ मनुवादी और ब्राह्मणवादी संघी सरकारें मनुस्मृति में दिये गए विधान से ही चलना श्रेष्ठ समझती है। बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों को भगवान बुद्ध के उपदेश के अनुसार अपना दीपक स्वयं बनना होगा और अपने ऊपर अकारण प्रताड़नाओं और शोषण का निवारण भी खुद तलाशना होगा।

Post Your Comment here.
Characters allowed :


01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05