




2026-09-12 13:43:28
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बुद्ध की धरती, अहिंसा के अग्रदूत और विश्वगुरु का राग अलापने वाली मोदी सरकार और देश भर में सामाजिक समरसता का उपदेश देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के दावों को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़े आईना दिखा रहे हैं। सिडनी स्थित प्रतिष्ठित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस द्वारा जारी ग्लोबल पीस इंडेक्स में भारत की बेहद कमजोर और निराशाजनक स्थिति ने सत्ता के सुनहरे दावों की असलियत उजागर कर दी है।
163 देशों की वैश्विक सूची में भारत 115 से 126 के निचले पायदानों के बीच ही झूल रहा है। भूटान (16-21वीं रैंक) और नेपाल (80-111वीं रैंक) जैसे छोटे पड़ोसी मुल्क भी आंतरिक शांति और नागरिक सुरक्षा के मामले में भारत से कहीं आगे खड़े हैं। यह इंडेक्स केवल युद्ध का नहीं, बल्कि देश के भीतर आम नागरिक की सुरक्षा, न्याय तक पहुंच और सरकार के रवैये का पैमाना है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र और जी-20 जैसे वैश्विक मंचों पर कहते हैं कि ‘भारत ने दुनिया को युद्ध नहीं, बुद्ध दिए हैं’, वहीं दूसरी तरफ मोहन भागवत अपने विजयदशमी और संगठनात्मक भाषणों में भारत को अहिंसक और विश्व का मार्गदर्शक बताते नहीं थकते। लेकिन सवाल यह है कि यदि देश विश्वगुरु बनने की राह पर है, तो वैश्विक शांति सूचकांक में हम दुनिया के सबसे अशांत देशों की कतार में क्यों खड़े हैं?
पीस इंडेक्स के अनुसार भारत की सीमाओं पर तनाव, टकराव और छुटपुट हिंसा तो है ही, अंदरूनी हालत पर नजर डालें तो साफ नजर आता है कि हमारा देश क्यों शीर्ष हिंसक देशों में शामिल हुआ है। अहिंसा के पुजारी गांधी के देश में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण कट्टर सांप्रदायिक और जातीय श्रेष्ठता के दंभ से भरा एक ऐसा समूह भी माना जाता है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का संरक्षण प्राप्त होने का आरोप है। विडंबना है कि ऐसे हिंसक लोग अपराध करके भी बच जाते हैं जबकि संविधान, कानून के राज और लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले हाशिए के लोग केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और शांतिपूर्ण विरोध करके भी सुनियोजित साजिÞश के तहत कानून के शिकंजे में फंस या फंसा दिए जाते हैं। आज देश में ऐसे तत्वों का एक बड़ा समूह सक्रिय है जो हिंसा को अपना राजनीतिक आर्थिक जातीय या सांप्रदायिक उद्देश्य पूरा करने के लिये सही मानता है।
अगर मोदी सरकार और मोहन भागवत सचमुच भारत को विश्व पटल पर शांति का प्रतीक बनाना चाहते हैं, तो उन्हें विदेशी दौरों और भव्य आयोजनों की चमक-धमक से बाहर निकलकर मणिपुर की गलियों, उत्तर प्रदेश के थानों और मध्य प्रदेश के दलित बस्तियों में फैली दहशत को खत्म करना होगा। शांति भाषणों से नहीं, न्याय और संवैधानिक समता से स्थापित होती है।





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