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न्यायपालिका की गिरती साख और टूटता जनता का भरोसा

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2026-10-17 16:21:59

किसी भी जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की धुरी उसकी स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका होती है। लोकतंत्र में जब कार्यपालिका निरंकुश होने लगे और विधायिका संख्याबल के उन्माद में जनसरोकारों को हाशिए पर धकेल दे, तब आम नागरिक अपनी अंतिम उम्मीद लेकर न्यायपालिका के द्वार पर दस्तक देता है। भारत के संविधान निमार्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय को केवल अपीलीय मंच नहीं बनाया था; इसे संविधान का संरक्षक, मूलभूत अधिकारों का रक्षक और राज्य की अतिवादी शक्तियों पर अंकुश लगाने वाली अंतिम संस्था का दर्जा दिया गया था। किंतु आज भारत जिस राजनीतिक, सामाजिक और संस्थागत दौर से गुजर रहा है, उसने स्वतंत्र भारत के सबसे गंभीर संकट को जन्म दे दिया है। संकट यह नहीं है कि अदालतें काम नहीं कर रहीं; संकट यह है कि अदालतें उस भूमिका में दिखने से कतरा रही हैं जिसकी अपेक्षा संविधान उनसे करता है। राजधानी की सड़कों पर उफनता जन-आक्रोश, चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते तीखे सवाल, असहमति की आवाजों पर कील-कांटों और लाठियों का प्रहार, पत्रकारों का उत्पीड़न और इन सबके बीच देश की सर्वोच्च अदालत की हिचकिचाहट—ये सभी इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि आम जनता के मन में न्यायपालिका की साख तेजी से गिर रही है और न्याय की चौखट से भरोसा दरक रहा है।

भारतीय न्यायपालिका का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब उसने कार्यपालिका की सत्ता को सीधी चुनौती देकर नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा की। केशवानंद भारती मामले में मूल संरचना का सिद्धांत प्रतिपादित करना हो या मेनका गांधी मामले में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) के दायरे का विस्तार करना—सर्वोच्च न्यायालय ने हर उस मोड़ पर दृढ़ता दिखाई जहां संविधान पर संकट मंडरा रहा था। मगर आज की न्यायपालिका का व्यवहार एक अजीब प्रकार की रणनीतिक चुप्पी या प्रक्रियागत देरी से ग्रस्त दिखाई देता है। जब संविधान के बुनियादी स्तंभों, संस्थागत स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों पर सीधा प्रहार होता है, तब अदालतों से त्वरित, साहसिक और स्पष्ट हस्तक्षेप की उम्मीद की जाती है। इसके विपरीत, देखने में यह आ रहा है कि देश के सबसे संवेदनशील मामलों को या तो अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया जाता है, या फिर जल्दबाजी न करने के नाम पर ऐसी तकनीकी औपचारिकताएं अपनाई जाती हैं जिनसे कार्यपालिका को अपने विवादास्पद कदम पूरे करने का भरपूर समय मिल जाता है। जब तक मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होता है, तब तक जमीनी हकीकत बदल चुकी होती है और अदालत केवल घटना के बाद की औपचारिकता बनकर रह जाती है।

हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत लाखों नागरिकों के नामों के संदिग्ध विलोपन, और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उपजा विवाद भारतीय लोकतंत्र के सबसे नाजुक बिंदु को उजागर करता है। चुनाव आयोग न तो कार्यपालिका का प्रशासनिक विभाग है और न ही सत्ताधारी दल का कोई उपक्रम। संविधान का अनुच्छेद 324 इसे निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की सर्वोच्च जिम्मेदारी और स्वायत्तता सौंपता है। जब देश के तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेदों की खबरें आती हैं और यह आरोप लगता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो आयुक्तों की सहमति के बिना एकतरफा निर्णय लिए, तो यह सीधे तौर पर संस्थागत संतुलन टूटने की चेतावनी है। यह महज एक प्रशासनिक मतभेद नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की उस सामूहिक प्रक्रिया का उल्लंघन है जिसे सत्ता के किसी एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रीकरण को रोकने के लिए बनाया गया था। विडंबना यह है कि जब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचता है, तो न्यायालय का रुख असाधारण रूप से हिचकिचाहट भरा नजर आता है। यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग जैसी कठिन संसदीय प्रक्रिया का प्रावधान है—ताकि कार्यपालिका चुनाव प्रमुख को मनमाने ढंग से न हटा सके। किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के विवादास्पद, अपारदर्शी या असंवैधानिक निर्णयों को न्यायिक जांच से छूट प्राप्त है।

न्यायालय के पास यह पूर्ण अधिकार और दायित्व है कि वह विवादित निर्णयों के आंतरिक रिकॉर्ड तलब करे, यह परखे कि निर्णय सामूहिक सहमति से लिए गए थे या नहीं, और यह सुनिश्चित करे कि किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया से वोट देने के मौलिक अधिकार का हनन न हो। किंतु जब अदालतें शुरूआती स्तर पर स्पष्ट और ठोस आदेश जारी करने के बजाय महज नोटिस जारी करने और जवाब मांगने की लंबी कसरत में उलझ जाती हैं, तो जनता में यह संदेह गहराने लगता है कि क्या न्यायपालिका सत्ता से सीधे टकराव से बचना चाहती है? यह हिचकिचाहट केवल किसी व्यक्ति विशेष का मामला नहीं है, बल्कि पूरे चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करने वाली साबित हो रही है।

मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों में नागरिकता पुष्टिकरण का प्रश्न एक और गंभीर संवैधानिक पेंच बनकर उभरा है। अतीत में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को मतदाताओं की पात्रता परखने की कुछ शक्तियां दी थीं, किंतु न्यायिक विमर्श में यह रेखा बेहद स्पष्ट होनी चाहिए कि मतदाता सूची से नाम हटाने का प्रशासनिक फैसला किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने या छीनने का अधिकार नहीं हो सकता। जब पूर्व न्यायाधीशों और विधिक विशेषज्ञों द्वारा इस प्रकार के प्रशासनिक फैसलों और उन पर न्यायालय के उदार रवैये पर सवाल उठाए जाते हैं, तो न्यायपालिका की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने पिछले फैसलों का आत्मनिरीक्षण करे। न्यायपालिका की महानता और साख हर पुराने फैसले पर अड़े रहने में नहीं, बल्कि अपने पर्यवेक्षण में हुई गलतियों को सुधारने और सत्ता द्वारा अधिकारों के दुरुपयोग को तुरंत रोकने में निहित है। जब सर्वोच्च न्यायालय अपने ही पहले के फैसलों की संकीर्ण व्याख्याओं के पीछे छिपने लगता है, तो आम नागरिक का यह विश्वास टूटता है कि संविधान उसकी नागरिकता और गरिमा की रक्षा करेगा।

हाल के सप्ताहों में राजधानी दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जो दृश्य देखने को मिले, वे किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए विचलित करने वाले हैं। जब लाखों की संख्या में विपक्षी दलों के नेता, नागरिक समाज के कार्यकर्ता, छात्र और युवा चुनावी पारदर्शिता की मांग को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो राज्य की प्रतिक्रिया किसी लोकतांत्रिक सरकार की नहीं, बल्कि एक दमनकारी तंत्र जैसी दिखाई देती है। कनॉट प्लेस से लेकर संसद मार्ग तक पूरे इलाके को छावनी में बदल देना, सड़कों पर नुकीली कीलें ठोकना, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को ठप कर देना, विपक्षी सांसदों और महिला नेताओं को घसीटना और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को जबरन हिरासत में लेना—यह सब क्या दर्शाता है? यह दर्शाता है कि असहमति को अपराध मान लिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने, विरोध करने और असहमति व्यक्त क रने का बुनियादी अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में कई फैसलों में यह दोहराया है कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र की सुरक्षा वाल्व है। किंतु जब राजधानी में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी जाती है और नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन होता है, तब न्यायपालिका की ओर से स्वत: संज्ञान लेने या कार्यपालिका को तुरंत कड़े निर्देश देने की जो तत्परता दिखनी चाहिए थी, वह नदारद रहती है। अदालतों द्वारा दी गई चेतावनियों के बावजूद जब पुलिस और प्रशासन नागरिकों पर अनपातिक बल प्रयोग करते हैं और न्यायालय इस पर सख्त कदम नहीं उठाता, तो यह संदेश जाता है कि सत्ता के दमन को न्यायपालिका और सरकार की मौन सहमति प्राप्त है।

प्रेस की स्वतंत्रता पर कुठाराघात: लोकतंत्र का चौथा स्तंभ—स्वतंत्र पत्रकारिता—आज अपने सबसे अंधकारमय दौर से गुजर रहा है। दिल्ली के प्रदर्शनों के दौरान जिस तरह से पत्रकारों को निशाना बनाया गया, वह देश के लोकतांत्रिक इतिहास में अभूतपूर्व है। बीबीसी, रॉयटर्स, बिजनेस स्टैंडर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर नवभारत टाइम्स, स्क्रॉल, न्यूजलॉन्ड्री, बूम और स्वतंत्र यूट्यूबर्स तक को पुलिसिया बर्बरता का सामना करना पड़ा। महिला पत्रकारों को पीटा गया, उनके साथ बदसलूकी की गई और कई वरिष्ठ पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने के अपराध में हिरासत में लिया गया। इतना ही नहीं, सच को दबाने के लिए सत्ता प्रायोजित छद्म पत्रकारों का एक नया तंत्र मैदान में उतारा गया, जिनका काम वास्तविक पत्रकारों को घेरना, उनके काम में बाधा डालना और घटनाक्रम की सच्ची तस्वीर को जनता तक पहुंचने से रोकना था। यह सब खुलेआम उस देश में हो रहा है जिसे गर्व से मदर आॅफ डेमोक्रेसी (लोकतंत्र की जननी) कहा जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने दशकों से स्थापित किया है कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रेस की स्वतंत्रता कोई अलग अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ही अभिन्न अंग है। पत्रकारों पर हमला दरअसल हर उस नागरिक के जानने के अधिकार पर हमला है जो अपने घर बैठकर सच जानना चाहता है। किंतु जब पत्रकारों की गैरकानूनी गिरफ्तारियों, उनके उपकरणों की जब्ती और उन पर थोपे गए फर्जी मुकदमों पर सुनवाई महीनों तक लटकी रहती है, तब क्या यह न्यायपालिका की साख पर धब्बा नहीं है? जिस देश की सर्वोच्च अदालत किसी सत्ता-समर्थक एंकर की जमानत के लिए रात को भी सुनवाई कर सकती है, उसी अदालत में स्वतंत्र पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकतार्ओं को बुनियादी जमानत पाने के लिए महीनों और वर्षों तक क्यों गुहार लगानी पड़ती है? न्याय का यह दोहरा मापदंड जनता के मन में न्यायपालिका की निष्पक्षता को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है।

न्यायपालिका के पतन के अंतर्निहित कारण

न्यायपालिका की साख में आई यह गिरावट अचानक नहीं हुई है; यह एक क्रमिक और योजनाबद्ध प्रक्रिया का परिणाम है। इसके पीछे कई संरचनात्मक और संस्थागत कारण हैं जैसे-

1. सीलबंद लिफाफा न्यायशास्त्र

पिछले कुछ वर्षों में एक खतरनाक न्यायिक परंपरा विकसित हुई है, जिसमें कार्यपालिका राष्ट्रीय सुरक्षा या संवेदनशील मामलों का हवाला देकर सीलबंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपती है। अदालतें बिना दूसरे पक्ष को वह सामग्री दिखाए उसके आधार पर फैसले सुना देती हैं। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की खुली हत्या है। जब न्याय की प्रक्रिया ही पारदर्शी नहीं होगी, तो उस पर जनता का भरोसा कैसे टिकेगा? 2. मास्टर आॅफ रोस्टर और बेंचों का चयनात्मक गठन

भारत के मुख्य न्यायाधीश को मास्टर आॅफ रोस्टर का विशेषाधिकार प्राप्त है, यानी वे यह तय करते हैं कि कौन सा मामला किस बेंच के पास जाएगा। हाल के वर्षों में यह आरोप बार-बार सामने आए हैं कि संवेदनशील राजनीतिक मामले, चुनाव से जुड़े विवाद और नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दे चुनिंदा अनुकूल बेंचों को सौंपे जाते हैं, जबकि वरिष्ठ और स्वतंत्र विचारों वाले जजों को इन मामलों से दूर रखा जाता है। जब रोस्टर प्रबंधन में ही निष्पक्षता का अभाव दिखने लगे, तो फैसलों की साख पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

3. सेवानिवृत्ति के बाद के पद

न्यायिक स्वतंत्रता का सबसे बड़ा दुश्मन सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले राजनीतिक पुरस्कार हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और जजों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राज्यपाल बनाना, राज्यसभा की सदस्यता देना या महत्वपूर्ण ट्रिब्यूनलों का अध्यक्ष नियुक्त करना—इस प्रवृत्ति ने न्यायपालिका की रीढ़ को कमजोर कर दिया है। जब एक कार्यरत जज यह सोचने लगे कि उसके फैसले का असर उसके सेवानिवृत्ति के बाद के करियर पर क्या पड़ेगा, तो संविधान और कानून की निष्पक्ष व्याख्या की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है।

4. तारीख पर तारीख और प्राथमिकताओं का संकट

जब देश में चुनावी पारदर्शिता, मानवाधिकार उल्लंघन और संवैधानिक संकट जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों पर त्वरित सुनवाई नहीं होती, लेकिन तुच्छ और गैर-जरूरी याचिकाओं पर घंटों समय दिया जाता है, तो जनता की निराशा हताशा में बदल जाती है। न्याय में देरी वास्तव में न्याय से इनकार है ।

वैश्विक मंच पर भारत की छवि और संयुक्त राष्ट्र की चिंताएं

भारत का लोकतंत्र केवल देश के 140 करोड़ नागरिकों का आंतरिक मामला नहीं है; यह वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आधारस्तंभ है। जब संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भारत में चुनावी निष्पक्षता, प्रेस की स्वतंत्रता और असहमति के दमन पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हैं, तो यह पूरे राष्ट्र की साख को प्रभावित करता है।

सत्ता पक्ष भले ही इन अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को विदेशी साजिश या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कहकर खारिज कर दे, किंतु सत्य यह है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा उसके स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थानों के दम पर ही टिकी थी। यदि भारत की सर्वोच्च अदालत अपने नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लोकतांत्रिक दावों का खोखलापन उजागर होना तय है।

क्या अभी भी कोई उम्मीद बाकी है? इस निराशाजनक परिदृश्य के बावजूद, यह नहीं माना जाना चाहिए कि सब कुछ समाप्त हो चुका है। भारतीय न्यायपालिका ने अतीत में भी गहरे संकटों से उबरने की क्षमता दिखाई है। आपातकाल (1975-77) के दौरान जब सर्वोच्च न्यायालय ने एडीएम जबलपुर मामले में नागरिकों के जीवन के अधिकार को भी निलंबित मान लिया था, तब न्यायपालिका की साख शून्य पर पहुंच गई थी। किंतु आपातकाल के बाद उसी अदालत ने जनहित याचिका की परंपरा शुरू करके और बुनियादी अधिकारों का विस्तार करके जनता का खोया हुआ भरोसा दोबारा हासिल किया था। आज फिर उसी प्रकार के साहसिक, क्रांतिकारी और निर्णायक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। न्यायपालिका अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को कैसे बहाल कर सकती है?

चुनावी पारदर्शिता पर निर्णायक कदम: सर्वोच्च न्यायालय को चुनाव आयोग के अंदरूनी कामकाज, असहमति के स्वरों और विवादित निर्णयों (विशेषकर मतदाता सूची संशोधन) की पारदर्शी न्यायिक जांच करानी चाहिए। यदि कहीं भी अनियमितता या संस्थागत मयार्दा का उल्लंघन पाया जाता है, तो बिना किसी राजनीतिक नफे-नुकसान की चिंता किए सुधारात्मक आदेश दिए जाने चाहिए।

नागरिक स्वतंत्रता का बिना शर्त संरक्षण: विरोध प्रदर्शनों के अधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की सीधी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जानी चाहिए। पत्रकारों पर हुए हमलों की स्वतंत्र न्यायिक जांच होनी चाहिए।

पारदर्शी कॉलेजियम और रोस्टर प्रणाली: जजों की नियुक्ति और मामलों के आवंटन (रोस्टर) में पूर्ण पारदर्शिता लाई जाए, ताकि जनता को यह भरोसा हो सके कि न्याय किसी चयनात्मक प्रक्रिया का मोहताज नहीं है।

सेवानिवृत्ति के बाद के पदों पर रोक: जजों के सेवानिवृत्त होने के बाद कम से कम दो वर्ष का कूलिंग-आॅफ पीरियड अनिवार्य किया जाए, ताकि किसी भी पद के लालच में फैसलों को प्रभावित होने से रोका जा सके।

न्यायपालिका में ब्राह्मणी संस्कृति का बोलबाला: बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘व्हॉट कांग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स’ में लिखा था कि किसी भी व्यक्ति का सामाजिक दृष्टिकोण उसकी जातिगत पृष्ठभूमि से पूरी तरह अछूता नहीं रह सकता। उनका तर्क था कि एक पारंपरिक रूढ़िवादी हिंदू (विशेषकर ब्राह्मण), जो जन्म-आधारित असमानता और शास्त्रों के पदानुक्रम में विश्वास रखता हो, वह शूद्रों या अछूतों के मामलों में पूरी तरह निष्पक्ष या न्यायसंगत दृष्टिकोण बनाए रखने में गंभीर वैचारिक सीमाओं से ग्रस्त हो सकता है। वहीं रामासामी पेरियार ने जस्टिस पार्टी और आत्मसम्मान आंदोलन के दौरान मद्रास प्रेसीडेंसी में न्यायिक और प्रशासनिक पदों पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व का कड़ा विरोध किया था और कहा था कि जब तक सभी जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तब तक निष्पक्ष न्याय संभव नहीं है।

निष्कर्ष: न्यायपालिका कोई ईंट-गारे से बनी इमारत नहीं है; यह एक विचार है, एक विश्वास है। उस विश्वास की बुनियाद इस बात पर टिकी होती है कि जब देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति भी संविधान का उल्लंघन करेगा, तो न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी उसे किसी भी तरह के पक्षपात से रोकेगी और न्याय का तराजू पूरी तरह संतुलित रहेगा। यदि सर्वोच्च न्यायालय समय रहते अपनी नींद से नहीं जागा और उसने सत्ता के निरंकुश रथ की लगाम खींचने का साहस नहीं दिखाया, तो इतिहास उसे एक ऐसे मूकदर्शक के रूप में याद रखेगा जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपनी आंखों के सामने ढहते देखा। सड़कों पर लाठियां खा रहे युवा, हिरासत में लिए जा रहे पत्रकार और मताधिकार छिन जाने के डर से सहमे आम नागरिक आज सवाल पूछ रहे हैं: यदि न्यायपालिका भी सत्ता की भाषा बोलने लगेगी, तो भारत का आम नागरिक कहां जाएगा? इस सवाल का जवाब किसी भाषण या सेमिनार से नहीं दिया जा सकता; इसका जवाब केवल और केवल सर्वोच्च न्यायालय के उन साहसिक फैसलों से दिया जा सकता है जो संविधान को सत्ता के आगे झुकने न दें। यह केवल न्यायपालिका की साख बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक अस्तित्व को बचाने की अंतिम लड़ाई है।

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02 अक्टूबर (1869) : महात्मा गांधी जयंती

02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

09 अक्टूबर (1924) : इमैनुअल सेकरन जयंती

13 अक्टूबर (1935) : नासिक के येवला सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा की

14 अक्टूबर (1956) : ऐतिहासिक धम्मदीक्षा दिवस: नागपुर दीक्षाभूमि में बाबा साहब द्वारा लाखों अनुयायियों संग बौद्ध धम्म ग्रहण किया गया।

15 अक्टूबर (1902) : कर्मवीर दादासाहेब भाऊराव कृष्णराव (बी. के.) गायकवाड़ जयंती

15 अक्टूबर (1931) : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती

16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

20 अक्टूबर (2026) : अशोक विजय दशमी

22 अक्टूबर (1947) : जनकवि अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) जयंती

25 अक्टूबर (1800) : लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले जन्मदिवस

27 अक्टूबर (1920) : भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन जयंती

29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

31 अक्टूबर (2004) : त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी समृति दिवस

2026-10-12 16:07:19