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पूरी तरह नाकाम रहा कॉलेजियम सिस्टम: दुष्यंत दवे

‘नागरिक-विरोधी’ हो गए हैं जज, संविधान के मूल स्वरूप से टूट चुका है उनका संपर्क
News

2026-07-11 16:59:41

नई दिल्ली। दिल से विद कपिल सिब्बल शो के एक इंटरव्यू में वकालत छोड़ देने वाले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीनियर वकील दुष्यंत दवे ने हाल ही में कहा कि जजों की नियुक्ति का कॉलेजियम सिस्टम पूरी तरह से नाकाम रहा है। दवे का मानना है कि पिछले कुछ सालों में जज नागरिक-विरोधी हो गए हैं और संविधान के मूल स्वरूप से उनका संपर्क टूट गया। उनके अनुसार, हाल के जजों ने अपने फैसलों में संविधान सभा की बहसों की सही समझ नहीं दिखाई और इसका एक कारण नियुक्ति की प्रक्रिया है।

दवे ने कहा, इसमें कोई शक नहीं कि इसका संबंध जजों की नियुक्ति के तरीके से है। मेरा मानना है कि सेकंड जजेज केस ने न्यायपालिका का स्वरूप ही बदल दिया। 1990 से पहले सरकार (एग्जीक्यूटिव) ने कुछ गलत नियुक्तियां की थीं, लेकिन वे बहुत कम थीं। साथ ही मैं कहूंगा कि उन दिनों चीफ जस्टिस की सिफारिशें काफी हद तक निष्पक्ष होती थीं और उन पर जजों के बीच अच्छी तरह से चर्चा और विचार-विमर्श होता था, जिससे अच्छी नियुक्तियां होती थीं।

उन्होंने आगे कहा, निस्संदेह, कॉलेजियम सिस्टम - जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खुद बनाया - पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ। 1995 के बाद से भारत के कितने चीफ जस्टिस का कामकाज सवालों के घेरे में रहा है? लगभग 20-25। भारत के चीफ जस्टिस के तौर पर उनका व्यवहार बहुत ही संदिग्ध रहा है।

इस मामले में सिब्बल ने कहा कि उन्हें सेकंड जजेज केस (जिसने कॉलेजियम सिस्टम को औपचारिक रूप दिया) में पेश होने का अफसोस है। उन्होंने बताया कि उस समय जजों की नियुक्ति में सरकार के दखल से निपटने के लिए ऐसा किया गया। फिर भी उन्होंने कहा कि उन्हें इस मामले में पेश होने का अफसोस है, जिसके कारण कॉलेजियम सिस्टम बना, क्योंकि नतीजा और भी खराब स्थिति वाला रहा है।

गौरतलब है कि इंटरव्यू के दौरान दवे ने एनजेएसी मामले में पूर्व सीजेआई खेहर की अध्यक्षता वाली 5 जजों की बेंच के सामने अपनी बात भी याद की, जिसमें उन्होंने सुझाव दिया था कि जजों को बुर्का पहनकर कोर्ट के गलियारों से गुजरना चाहिए ताकि वे समझ सकें कि वकील (बार) असल में उनके बारे में क्या सोचते हैं।

उन्होंने कहा, मैं उनके (जजों के) चरित्र पर सवाल नहीं उठा रहा था... मैं बस यह कह रहा था कि एक चुनौती है और आप उस चुनौती का सामना करने को तैयार नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह कॉलेजियम सिस्टम है, जिसमें नियुक्तियां सचमुच बहुत खराब होती हैं। दवे ने आगे कहा कि कॉलेजियम सिस्टम की वजह से ऊपरी अदालतों को न सिर्फ जजों के चरित्र के मामले में बल्कि उनकी काबिलियत के मामले में भी नुकसान हुआ है। उन्होंने कहा कि आज के समय में अच्छे जज बहुत कम हैं, जबकि ज्यादातर में कानूनी मामलों का अनुभव कम है।

दवे ने इस बात पर भी गौर किया कि कितने ही अच्छे वकील, जिन्हें ऊपरी न्यायपालिका में जगह मिलनी चाहिए थी, कॉलेजियम सिस्टम की नाकामियों की वजह से नजरअंदाज कर दिए गए, जबकि कम काबिल लोग शीर्ष पदों पर पहुंच गए। आज बार (वकीलों का समूह) में कुछ बेहतरीन वकील हैं, जो पहचान पाने के हकदार हैं। पिछले 30-40 सालों से हम देख रहे हैं कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है - जो हाईकोर्ट जज बनने के लायक हैं - और कुछ ऐसे लोगों को नियुक्त किया गया, जो असल में इसके लायक नहीं थे। इसी तरह निचली न्यायपालिका में भी मुझे कोई शक नहीं है कि कुछ बेहतरीन जज हैं और हाईकोर्ट में पदोन्नति के समय उन जजों को नजरअंदाज किया गया। बाद में सिब्बल और उन्होंने इस बात पर चर्चा की कि कॉलेजियम सिस्टम, जिसे निष्पक्ष होना चाहिए, वह बहुत ज्यादा व्यक्तिपरक (यानी अपनी पसंद-नापसंद पर आधारित) हो गया।

दवे ने टिप्पणी की, मुझे सेकंड जजेज केस का एक वाक्य याद है, जो असल में मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए - कि आपको उपलब्ध लोगों में से सबसे अच्छे को चुनना चाहिए। आप [कॉलेजियम] ऐसा नहीं करते हैं। इस संबंध में सिब्बल ने कहा कि जब जजों को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया जाता है तो वे अपने संबंधित हाईकोर्ट के जजों के अनुभव साथ लाते हैं। इसलिए जब वे कॉलेजियम का हिस्सा बनते हैं तो शायद वे अपने खास उम्मीदवारों की वकालत करते हैं। इसके परिणामस्वरूप कॉलेजियम के जजों के बीच एक-दूसरे की मांगों को पूरा करने के लिए जो बातचीत होती है, उससे मेरिट (योग्यता) कम हो जाती है।

सिब्बल ने कहा, यह लेन-देन का मामला है... मुझे लगता है कि इस तरह की सौदेबाजी होती है। इस प्रक्रिया में सरकार भी कहती है कि हमें अपने उम्मीदवार चाहिए... इस तरह की सौदेबाजी होती है, जो मेरिट से बहुत दूर है। काबिलियत और गुणवत्ता में कमी का यह भी एक कारण हो सकता है।

दवे इस बात से पूरी तरह सहमत थे कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के लेवल पर कॉलेजियम सिस्टम में लेन-देन चलता है, जिसकी वजह से काबिल उम्मीदवारों को नहीं चुना जाता। उन्होंने आगे कहा कि जब से भाजपा सत्ता में आई है, कॉलेजियम पर एग्जीक्यूटिव का दबदबा बढ़ता जा रहा है क्योंकि तब से हर सीजेआई कमजोर रहा है।

शायद... आखिरी जज जो अपनी बात पर अडिग रहे, वह चीफ जस्टिस ठाकुर थे... उसके बाद एक के बाद एक जज, मैं कहूंगा, झुकते गए और असल में वह एडमिनिस्ट्रेटिव मामलों में एग्जीक्यूटिव के गुलाम बन गए। मुझे ऐसे मामले पता हैं, जहां चीफ जस्टिस बंद दरवाजों के पीछे एग्जीक्यूटिव के साथ मेल-जोल रखते थे। इसके बाद दवे ने अफसोस जताया कि पहले के चलन के विपरीत, जब जज एग्जीक्यूटिव के सदस्यों के साथ मेल-जोल नहीं रखते, अब जजों के लॉ मिनिस्टर और होम मिनिस्टर के साथ मेल-जोल रखने की चौंकाने वाली कहानियां सामने आ रही हैं।

उन्होंने दावा किया, होम मिनिस्टर के साथ बातचीत के कारण चीफ जस्टिस देर तक कोर्ट में बैठे रहे। दवे और सिब्बल दोनों ने उन अफवाहों पर भी बात की कि प्रमोशन के लिए नामों की सिफारिश करने से पहले चीफ जस्टिस एग्जीक्यूटिव की सहमति लेते हैं। गुजरात का जिÞक्र करते हुए दवे ने कहा कि जस्टिस जयंत पटेल और जस्टिस अकील कुरैशी को टारगेट किया गया और उनके साथ भेदभाव किया गया, जब उनके प्रमोशन पर विचार किया जा रहा था, क्योंकि उन्होंने सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ न्यायिक फैसले दिए।

दवे ने कहा, कॉलेजियम भी इस टारगेट करने की प्रक्रिया में शामिल था, यही दुखद कहानी है... कॉलेजियम में मौजूद अच्छे जज, जिनका हम सम्मान करते हैं, वे भी उनकी रक्षा करने में नाकाम रहे।

उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर (अब सीनियर एडवोकेट) का भी जिÞक्र किया, जिनका ट्रांसफर तब कर दिया गया, जब उन्होंने दिल्ली दंगों से पहले हेट स्पीच के लिए 3 बीजेपी नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज न करने पर दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई।

दवे ने कहा, ऐसे कई लोग हैं जिन्हें कॉलेजियम ने नजरअंदाज किया, क्योंकि वे एग्जीक्यूटिव के दबाव में काम कर रहे थे। सिब्बल ने जवाब दिया, वजह यह है कि अगर कोई जज स्वतंत्र फैसला देता है तो या तो उसका ट्रांसफर कर दिया जाता है या सुप्रीम कोर्ट आने के उसके मौके खत्म कर दिए जाते हैं। इसलिए दूसरे जज, जो जानते हैं कि ऐसा हो रहा है, वे भी वैसा ही हश्र नहीं भुगतना चाहेंगे। दिलचस्प बात यह है कि दवे ने गुजरात हाईकोर्ट में वकील के तौर पर अपने शुरूआती दिनों को भी याद किया और उस समय हाईकोर्ट के जजों की काबिलियत और ईमानदारी की तारीफ की। उन्होंने कहा कि उस समय गुजरात हाईकोर्ट के जजों के सामने पेश होना एक शानदार अनुभव होता था। आज के गुजरात हाईकोर्ट के बारे में सिब्बल के सवाल पर दवे ने कहा कि हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के साथ बातचीत से यह साफ पता चलता है कि अब इसकी छवि अच्छी नहीं रही है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05