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मायावती का ‘एकछत्र राज’ और युवा नेतृत्व के सामने अस्तित्व का संकट

क्या आकाश आनंद को बाहर करके बहन जी ने आसान कर दी चंद्रशेखर आजाद की राह?
News

2026-09-12 13:54:27

संवाददाता

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) दशकों तक सामाजिक परिवर्तन और वंचितों की सत्ता-भागीदारी का सबसे मजबूत स्तम्भ रही है। मान्यवर कांशीराम द्वारा रोपे गए इस पौधे को बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने आक्रामक तेवरों और रणनीतिक गठजोड़ों से सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया। चार बार उत्तर प्रदेश की कमान संभालने वाली बहन मायावती जी का राजनीतिक दबदबा ऐसा था कि उनके एक इशारे पर भारतीय राजनीति की दिशा तय होती थी। लेकिन 11 सितंबर 2026 की सुबह जो राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि बसपा के भीतर उत्तराधिकार, आंतरिक सत्ता-संघर्ष और परिवारवाद की गुत्थियाँ सुलझने के बजाय और उलझती जा रही हैं। मायावती ने अपने भतीजे और पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद को पार्टी से निष्कासित कर दिया। यह निष्कासन तब हुआ जब महज कुछ घंटे पहले ही आकाश के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. अशोक सिद्धार्थ ने पार्टी सुप्रीमो की कथित शर्त के अनुसार राजनीति और सार्वजनिक जीवन से पूर्ण संन्यास की घोषणा कर दी थी। इस फैसले ने न केवल बसपा के कैडर को स्तब्ध कर दिया है, बल्कि बहुजन आंदोलन से जुड़े बुद्धिजीवियों के सामने एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है: क्या यह फैसला बहुजन मिशन को बचाने के लिए लिया गया है, या फिर यह पारिवारिक नियंत्रण की रस्साकशी का नतीजा है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या मायावती के इस कदम ने नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के लिए उत्तर प्रदेश दलित राजनीति की बागडोर संभालने का रास्ता पूरी तरह साफ कर दिया है? बहन जी के इस कड़े कदम को दो नजरियों से देखा जा रहा है।

पहला नजरिया (मिशन सर्वोपरि) : मायावती के समर्थकों का तर्क है कि बसपा कोई साधारण चुनावी दल नहीं, बल्कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर और कांशीराम का वैचारिक आंदोलन है। मायावती किसी भी ऐसे व्यक्ति को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं जो समानांतर सत्ता केंद्र (पैरेलल पावर सेंटर) बनाने की कोशिश करे। अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद के गठजोड़ से पार्टी के भीतर जो गुटबाजी पनपने की आशंका थी, मायावती ने उसे जड़ से खत्म कर दिया। इस नजरिए से, पार्टी के अनुशासन और एकछत्र नेतृत्व को बचाने के लिए यह एक कड़ा लेकिन आवश्यक कदम था।

दूसरा नजरिया (अस्थिरता और परिवारवाद): दूसरी तरफ, राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के बीच में आकाश आनंद को अचानक हटाना, फिर मार्च 2026 में उनकी वापसी कराना, और सितंबर 2026 में पहले पद छीनकर छोटे भाई ईशान को लाना और फिर आकाश को निकाल बाहर करना—यह स्थिरता का नहीं, बल्कि असमंजस का परिचायक है। यदि आकाश को हटाकर उनके सगे भाई ईशान आनंद को ही आगे बढ़ाया जा रहा है, तो सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच मिशन की लड़ाई है, या फिर सिर्फ परिवार के भीतर किसे कितनी सत्ता मिले, इसका संघर्ष?

इस फैसले का सबसे दर्दनाक पहलू बसपा के जमीनी कार्यकतार्ओं और दलित युवाओं की प्रतिक्रिया है। जिनका मानना है कि आकाश आनंद लंदन से शिक्षित एक आधुनिक युवा के रूप में उभरे थे। उन्होंने सोशल मीडिया, आक्रामक भाषणों और युवाओं के मुद्दों (जैसे बेरोजगारी, पेपर लीक, संविधान सुरक्षा) को उठाकर बसपा में एक नई जान फूंकने की कोशिश की थी। पहली बार सोशल मीडिया पर बसपा का युवा वर्ग मुखर होकर बहस कर रहा था। बार-बार नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाए जाने से जिला और बूथ स्तर के कार्यकतार्ओं में डर का माहौल है। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि पार्टी का भविष्य किस दिशा में जा रहा है। जिस समय देश और उत्तर प्रदेश में आरक्षण के वर्गीकरण (सब-क्लासिफिकेशन), निजीकरण, और संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारों को लेकर बहुजन समाज सड़कों पर संघर्ष की उम्मीद कर रहा है, उस समय बसपा का अपने ही पारिवारिक विवादों में उलझ जाना कैडर को हताश कर रहा है।

रावण उठायेगा फायदा? इस पूरे राजनीतिक भूचाल का सबसे बड़ा लाभार्थी कौन होगा? इस सवाल का सीधा और स्पष्ट जवाब है—चंद्रशेखर आजाद रावण। 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट से भारी मतों से जीतकर संसद पहुंचे चंद्रशेखर आजाद ने पहले ही यह साबित कर दिया है कि वे केवल एक आंदोलनकारी नहीं, बल्कि चुनावी जमीन तैयार करने वाले नेता हैं। आकाश आनंद के बाहर होने से चंद्रशेखर को प्रत्यक्ष लाभ मिलते दिख रहे हैं। दलित युवा आज रक्षात्मक राजनीति के बजाय सड़कों पर उतरकर लड़ने वाली आक्रामक राजनीति पसंद करता है। आकाश आनंद बसपा के भीतर इस आक्रामकता का चेहरा बन रहे थे। उनके हटने के बाद अब पूरे उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर आजाद ही एकमात्र ऐसे युवा दलित नेता बचते हैं जो सीधे सत्ता से टकराने की छवि रखते हैं। वहीं बसपा का मुख्य आधार जाटव समाज रहा है। हालांकि, चंद्रशेखर ने नगीना और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह दिखाया है कि जाटव युवाओं का एक बड़ा वर्ग मायावती के प्रति भावनात्मक लगाव रखने के बावजूद वोट चंद्रशेखर को देने में हिचक नहीं रहा है। आकाश के निष्कासन से जो युवा बसपा से नाराज होगा, उसका स्वाभाविक झुकाव आजाद समाज पार्टी की ओर होगा। 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल दलित मतों को साधने के लिए बसपा के बजाय चंद्रशेखर आजाद को अधिक विश्वसनीय और ऊजार्वान साथी के रूप में देख सकते हैं। बसपा का अकेले चुनाव लड़ने का अड़ियल रुख और आंतरिक कलह उसे गठबंधन की राजनीति में और अलग-थलग कर रही है।

बसपा के अस्तित्व पर संकट के बादल: 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी और उसका वोट शेयर घटकर लगभग 12.8% रह गया था। 2024 के आम चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला और वोट शेयर गिरकर 9.39% पर आ गया। इन लगातार गिरते आंकड़ों के बीच 2027 का चुनाव बसपा के लिए करो या मरो की लड़ाई है। ऐसे नाजुक मोड़ पर पार्टी के सबसे लोकप्रिय युवा चेहरे को बाहर करना चुनावी गणित के लिहाज से आत्मघाती साबित हो सकता है। यदि पार्टी के पारंपरिक मतदाता को यह लगा कि बसपा अब सत्ता की दौड़ से बाहर होकर केवल आंतरिक झगड़ों का अखाड़ा बन चुकी है, तो यह वोट बैंक पूरी तरह सपा, भाजपा और चंद्रशेखर आजाद के बीच बंट जाएगा।

मायावती ने अपने फैसलों से हमेशा चौंकाया है और वे अनुशासन के मामले में किसी समझौते के लिए नहीं जानी जातीं। लेकिन राजनीति केवल अनुशासन से नहीं, बल्कि जनभावनाओं, समय की मांग और कार्यकतार्ओं के मनोबल से चलती है। आकाश आनंद को बाहर का रास्ता दिखाकर मायावती ने भले ही पार्टी संगठन पर अपनी निर्विवाद पकड़ की पुष्टि कर दी हो, लेकिन उन्होंने अनजाने में बहुजन राजनीति के उस मंच को खाली कर दिया है, जिस पर कदम रखने के लिए चंद्रशेखर आजाद पूरी ताकत से तैयार खड़े हैं।

बहुजन समाज पार्टी के जागरूक व परिपक्त लोगों का मानना है कि बहनजी का यह कदम आत्मघाती है, और समाज को धोखा देने जैसा है। पिछले कई वर्षों से बहनजी की राजनीति अपने ही परिवार के अयोग्य व असंघर्षशील लोगों के इर्दगिर्द घूम रही है। जिसे देखकर बसपा का जागरूक और संघर्षशील कार्यकर्ता अब बहनजी को समाज का कारगर नेता न मानकर मनुवादी-संघियों की राजनीति को फायदा पहुंचाने वाली नेता मानने लगा है। इसके पीछे दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि मोदी-संघी शासन शक्ति से अपने परिवार के लिए अवैध रूप से कमाये गये धन व संपत्ति को सुरक्षित भी रखना है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05