




2026-07-11 17:03:09
नई दिल्ली। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने साल 2021 में नांदेड़ जिÞले में एक सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से जान गंवाने वाले दो श्रमिकों के परिवारों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने सोमवार (6 जुलाई) को राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह दोनों पीड़ित परिवारों को 30-30 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे।
रिपोर्ट के मुताबिक, मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्केवेंजिंग) की प्रथा के जारी रहने पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे सभ्य समाज पर एक गंभीर कलंक बताया है। हाईकोर्ट की जस्टिस नितिन बी. सूर्यवंशी और जस्टिस वैशाली पाटिल-जाधव की पीठ ने कहा कि ये मौतें इस अमानवीय और अपमानजनक प्रथा को पूरी तरह खत्म करने में सामूहिक विफलता को दशार्ती हैं। कोर्ट ने राज्य के सामाजिक न्याय विभाग को निर्देश दिया है कि नांदेड़ जिÞला कलेक्टर से औपचारिक प्रस्ताव मिलने के आठ सप्ताह के भीतर मुआवजे की राशि जारी कर दी जाए। इसके साथ ही पीठ ने चेतावनी दी है कि यदि मुआवजे के भुगतान में किसी भी तरह की देरी होती है, तो इस राशि पर 6 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह फैसला दोनों पीड़ित परिवारों की ओर से दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सामने आया है। दोनों मृतक श्रमिक अपने परिवार के कमाने वाले इकलौते सदस्य थे।
बेंच ने दोहराई बाबा साहेब की बात
हमारी लड़ाई दौलत या सत्ता के लिए नहीं है; यह आजादी की लड़ाई है। यह इंसानी पहचान को वापस पाने की लड़ाई है। इस बात पर भी जोर दिया गया कि हाथ से मैला ढोने का काम संविधान के आर्टिकल 15, 17, 21, 23 और 24 के तहत मिलने वाली गरिमा, समानता और भाईचारे के खिलाफ है।
याचिकाकतार्ओं की ओर से पैरवी कर रही वकील आभा सिंह ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जानकारी देते हुए कहा कि इस केस में हाईकोर्ट ने बलराम सिंह बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का हवाला दिया है। इस फैसले में सेप्टिक टैंक में होने वाली मौतों के लिए मुआवजे की रकम को 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया गया था। यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के 2014 के अहम फैसले (सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत सरकार) के बाद किया गया था, जो मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर रोजगार और उनके पुनर्वास पर रोक अधिनियम, 2013 के तहत आया था। यह कानून खुले नालों, शौचालयों और सेप्टिक टैंकों की हाथ से सफाई के लिए किसी भी व्यक्ति को काम पर रखने को अपराध मानता है और जहां सफाई करना जरूरी हो, वहां सुरक्षा के लिए उचित उपकरण इस्तेमाल करना अनिवार्य बनाता है। मौजूदा मामले में मुआवजे की रकम बढ़ाते हुए बेंच ने साफ तौर पर कहा कि 21वीं सदी के भारत में किसी को भी सीवर लाइन में नहीं उतरना चाहिए।
रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस पाटिल-जाधव ने राज्य को तीन महीने के भीतर यह देखने का निर्देश दिया कि क्या पीड़ित परिवार विशेष कानून के तहत पुनर्वास के पात्र हैं। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में वकील आभा सिंह ने कहा कि यह फैसला केवल मुआवजे के बारे में नहीं है और उन्होंने इस विश्वास को दोहराया कि कानून द्वारा लंबे समय से प्रतिबंधित प्रथा के कारण किसी की जान जाने के चार साल बाद भी संविधान समाधान का रास्ता निकाल लेता है। मामला क्या था? यह मामला 19 सितंबर 2021 का है, जब नांदेड़ जिÞले के मुखेड तालुका के अशोकनगर में एक प्राइवेट सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय मारोती चोपवाड और नागेश घुमलवाड नाम के दो दिहाड़ी श्रमिकों की दम घुटने और डूबने से मौत हो गई थी। ये लोग बिना किसी सुरक्षा उपकरण या कानूनी मंजूरी के काम कर रहे थे। इस घटना के बाद मार्च 2024 में आभा सिंह ने एक रिट याचिका दायर की थी। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से मृतकों के दुखी परिवारों के लिए जवाबदेही और मुआवजे की मांग की, क्योंकि उन्हें सालों तक या तो आधा-अधूरा मुआवजा मिला या फिर सरकार ने जिÞम्मेदारी लेने से ही इनकार कर दिया, और सरकारी मशीनरी उन पीड़ित परिवारों के मामले में बहुत धीमी गति से काम कर रही थी जिन्होंने पहले ही सब कुछ खो दिया था। याचिका में इस बात पर जोर दिया गया कि नियोक्ताओं ने खतरनाक काम करवाने के लिए स्थानीय अधिकारियों से कोई औपचारिक अनुमति नहीं ली थी और न ही कोई सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराया गया था, जैसा कि 2013 के कानून के तहत उन मामलों में जरूरी है जहाम सफाई का काम अनिवार्य होता है।
रिपोर्ट के अनुसार, आभा सिंह ने आगे बताया कि 2013 के कानून के तहत नवंबर 2021 में एक एफआईआर दर्ज की गई थी और दोनों पीड़ित परिवारों ने नांदेड़ कलेक्टर से मुआवजे की मांग की थी। लेकिन प्रशासन ने इस पर कोई खास कदम नहीं उठाया, जिससे पीड़ित परिवार गंभीर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, सरकारी वकील पीके लखोटिया ने सरकार की जिम्मेदारी का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि दिसंबर 2019 के एक सरकारी प्रस्ताव के तहत यदि काम किसी निजी संपत्ति पर व्यक्तिगत स्तर पर किया गया हो, तो मुआवजे के भुगतान की पूरी जिम्मेदारी निजी संपत्ति के मालिक की होती है। हालांकि, संपत्ति के मालिक के वकील जीआर इंगोले ने स्पष्ट किया कि उनके मुवक्किल ने जिला कलेक्टर के एक निर्देश के बाद 2022 में ही दोनों परिवारों को 2.25-2.25 लाख रुपये की सहायता राशि दे दी थी। उन्होंने तर्क दिया कि मुआवजे की अंतिम जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों की ही बनती है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के पिछले फैसलों का अध्ययन करने के बाद अदालत ने राज्य सरकार को 30-30 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।





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