




2026-02-28 16:24:34
भारत में भ्रष्टाचार कथित वैदिक काल से ही है। भ्रष्टाचार मुख्यतया व्यक्ति की नियत और संस्कृति से जुड़ा मुद्दा है। यह मुद्दा यूं तो व्यक्तिगत है लेकिन यह मुद्दा मनुष्य की सांस्कृतिक परवरिश से भी फलीभूत होता है। भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अन्य क्षेत्रों में भी भ्रष्टाचार देखा जाता है। भारत एक बहुलतावादी संस्कृति का देश है, यहाँ पर बहुत सारे संप्रदाय, बहुत सारे धार्मिक मान्यताओं वाले, बहुत सारी भाषाओं को बोलने वाले, बहुत सारे क्षेत्रों के लोग निवास करते हैं। भ्रष्टाचार किसी एक जाति या धर्म से जुड़ा मुद्दा नहीं है, यह आमतौर पर व्यक्तिगत बुराई है। भ्रष्टाचार मुख्यतया व्यक्ति की नियत और उसकी संस्कृति से जुड़ा होता है।
भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ: भ्रष्ट आचरण, जब कोई व्यक्ति, अधिकारी या संस्था अपने पद, शक्ति और अधिकारों का गलत इस्तेमाल करके अपने निजी स्वार्थ या आर्थिक फायदे के लिए काम करता है तो उसे भ्रष्ट कहा जाता है। भ्रष्टाचार किसी भी देश, समाज और व्यवस्था की तरक्की में सबसे बड़ी बाधा है। भ्रष्टाचार समाज में दीमक की तरह सिस्टम को अंदर ही अंदर खोखला कर देता है। जिन संस्थाओं, विभागों और सार्वजनिक कार्यालयों में जनता को अपना काम कराने के लिए अवैध तरीके से धन देकर कार्य कराना पड़े, वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है। भारत में भ्रष्टाचार कई रूपों में पाया जाता है-
रिश्वत खोरी: व्यक्ति अपना काम निकलवाने या किसी का जायज काम रुकवाने के लिए, अवैध रूप से वह पैसे या उपहार का लेना-देना करता है। वह कृत्य भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।
भाई-भतीजावाद: योग्यता को दर-किनार करके, अपने रिशतेदारों, दोस्तों या करीबियों को नौकरी, पद या सरकारी ठेके देना आदि है।
गबन: जनता के टैक्स के पैसे या सरकारी खजाने की चोरी और हेरा-फेरी करना। गबन की घटनाएँ आज के समय में आम हो चली हैं।
बसूली: व्यक्ति अपनी हैसियत का नाजायज फायदा उठाकर अगर किसी को डरा-धमकाकर ब्लैकमेल करके किसी से भी धन की उगाही या वसूली करता है तो वह भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। बसूली रूपी भ्रष्टाचार देश में एक संगठित रूप ले चुका है, जिसके देश में बड़े-बड़े गैंग काम कर रहे हैं, जिन्हें सरकार से भी संरक्षण मिल रहा है।
भ्रष्टाचार के कारण: पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी; जब सिस्टम में काम-काज को लेकर खुलापन नहीं होता, तो वहां पर भ्रष्ट आचरण पनपता है।
कानूनी प्रक्रिया में देरी: मामलों की जांच और न्याय मिलने में सालों लग जाना, और दोषियों को जल्द-से जल्द और सख्त सजा न मिलना।
लालच और नैतिक पतन: मनुष्य रातों-रात अमीर बनने की चाहत रखता है और समाज में नैतिक मूल्यों में भारी गिरावट का आना भ्रष्टाचार को बढ़ाता है।
जटिल सरकारी नियम: कई बार नियम और कागजी कार्रवाही इतनी उलझी हुई होती है कि आम आदमी अपना काम जल्दी कराने के लिए रिश्वत देने के लिए मजबूर हो जाता है।
भ्रष्टाचार के प्रभाव:
विकास में बाधा: जनता का पैसा जो स्कूल, अस्पताल, सड़कों और अन्य जन कल्याण की योजनाओं के लिए होता है, वह आजकल आमतौर पर भ्रष्ट लोगों के जेब में चला जाता है।
असमानता और शोषण: भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव समाज के निचले हाशिये पर रह रहे गरीब और वंचितों को ही अधिक उठाना पड़ता है, क्योंकि उन्हें भ्रष्टाचार के कारण उनके हकों व अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है।
व्यवस्था से उठ रहा भरोसा: वर्तमान समय में देश की आम जनता का सरकार, पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका व सरकार के अन्य विभागों से जनता का भरोसा कम होता जा रहा है।
भ्रष्टाचार की जड़े: भारत की संस्कृति को ऐतिहासिक रूप से देखने से पता चलता है कि भ्रष्टाचार की जड़े यहाँ प्राचीन वैदिक काल से ही है। वैदिक काल की संस्कृति ने मुख्य रूप से वर्ण-व्यवस्था के आधार पर समाज को चार वर्णों में बांटा और यहाँ पर ब्राह्मण वर्ण को सबसे श्रेष्ठ बताकर पहले पायदान पर रखा। दूसरे पायेदान पर क्षत्रिय वर्ण रखा जिनका मुख्य कार्य देश की रक्षा करना बताया गया। तीसरे पायेदान पर वैश्य वर्ण को रखा, जिनका मुख्य कार्य व्यापार और वाणिज्य रखा। चौथे पायेदान पर शूद्र वर्ण को रखा और उनका कार्य ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा और वह भी बिना किसी मेहनताने के। पहले पायदान पर ब्राह्मण वर्ण ने देश में वैश्य वर्ण के लोगों से दान इत्यादि के माध्यम से मंदिरों का निर्माण किया और इन सभी मंदिरों में ब्राह्मण-पुजारियों को स्थापित किया। इन्हीं ब्राह्मण-पुजारियों के माध्यम से देश के धनाढ्य लोगों से अवैध रूप से धन इकट्ठा किया। देश में जितने भी मंदिरों का निर्माण हुआ वे अधिकांशतया पिछड़े वर्ग की जमीनों पर कब्जा करके बनाए गए और इन्हीं में ब्राह्मण-पुजारियों को स्थापित किया गया। देश में एक आम किवदंती है कि पुजारी और भिखारी कभी भी देशभक्त नहीं हो सकते। यह किवदंती सत प्रतिशत सत्य ही नजर आती है चूंकि देश में जितने भी बाहर से आक्रमण हुए उनका मुख्य कारण यही था कि देश की जनता भूखी नंगी थी मगर देश की धन-संपदा मंदिरों में संगृहीत थी।
देश में ब्राह्मण धर्म स्थापित होने से पहले बुद्ध धम्म जनता का धम्म था और देश में बुद्ध धम्म के बड़े-बड़े भव्य बुद्ध विहार थे जिनको पुष्यमित्र शुंग की सत्ता आने के बाद ध्वस्त किया गया और उनके स्थान पर बुद्ध विहारों को परिवर्तित करके मंदिर बनाए गए। आज देश में ऐसे कई मंदिर है जो पहले यहाँ पर भव्य बुद्ध विहार थे। ऐसे कुछेक परिवर्तित मंदिरों के नाम है-जगन्नाथ पुरी का मंदिर, तिरुपति बालाजी का मंदिर, केदारनाथ का मंदिर, बद्रीनाथ का मंदिर, गुजरात में द्वारका का मंदिर व अन्य सैकड़ों ऐसे ही बड़े मंदिर है जो प्राचीन समय में यहाँ के भव्य बुद्ध विहार थे। ब्राह्मण संस्कृति के लोगों ने यहाँ की आम जनता को भूखा नंगा रखा लेकिन देश की जनता को भिन्न-भिन्न तरीके से लूटकर धन को मंदिरों में संग्रहीत करके रखा जिसपर पूरा आधिपत्य ब्राह्मण-पुजारियों का ही था।
कुछेक ब्राह्मण-पुजारियों ने यहाँ के मंदिरों में अवैध रूप से रखी गई संपदा की विदेशी आक्रमणकारियों से मुकबरी की और मंदिरों को लूटने की साजिश रचवाई। सोमनाथ का मंदिर गजनवी द्वारा ब्राह्मणों की मुकबरी के कारण ही लूटा गया था। जिस समय सोमनाथ का मंदिर गजनवी द्वारा लूटा गया तो वहाँ पर उस समय करीब 600 ब्राह्मण-पुजारी मौजूद थे और उनके साथ इतनी ही संख्या में मंदिर के सुरक्षाकर्मी भी मौजूद थे। लेकिन मंदिर में मौजूद ब्राह्मण-पुजारी वहाँ के सुरक्षा कर्मचारियों से कहते रहे कि आप चिंता न करो, आक्रमणकारियों को आने दो हम उन्हें अपने मंत्रों से भस्म कर देंगे और मंदिर सुरक्षित रहेगा, ब्राह्मण-पुजारियों का यह एक छिपा षड्यंत्र था, लूटी गई संपदा में ब्राह्मण-पुजारियों का भी कुछ न कुछ हिस्सा तय था।
वर्तमान सरकार के भ्रष्टाचार: देश की वर्तमान सरकार में भ्रष्टाचार का खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है। मनुवादी संघी सरकार का मुख्य जोर भवन व सड़कों के निर्माण पर है, देश की जनता जानती है कि अगर देश में निर्माण कार्य अधिक होंगे तो भ्रष्टाचार भी उसी अनुपात में अधिक बढ़ेगा। वर्तमान सरकार का जोर जन कल्याण की योजनाओं पर नहीं है बल्कि उसका जोर हाई-वे बनवाने पर, पुरानी मजबूत सरकारी बिल्डिंगों को तोड़कर उनके स्थान पर नए निर्माण कराना, जनता की आवाज को दबाना, प्रजातंत्र और संविधान को ध्वस्त करना है। वर्तमान मोदी संघी सरकारों का जोर मंदिर निर्माण, और देश में हिन्दू-मुसलमान का राग अपालकर सामाजिक नफरत को बढ़ाना है। देश में हर रोज जितने भी पुलों का निर्माण हो रहा है उनके निर्माण भ्रष्टाचार के कारण अधिकांशत: वे बनने से पहले ही गिर रहे हैं। देश के मोदी अंधभक्त सरकार के भ्रष्टाचार को ढकने में नंगे होकर लगे हैं।
मंदिरों में दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध: ऐसा लगता है कि मंदिरों में दलितों के प्रवेश को इसलिए प्रतिबंधित रखा था कि मंदिर में बैठे पुजारियों द्वारा किया जा रहा भ्रष्टाचार देश के मूलनिवासी (दलित) को पता न लग जाये। चूंकि यहाँ का मूलनिवासी (एससी/एसटी/ओबीसी) आम तौर पर ईमानदार और स्पष्टवादी है और राष्ट्रवादी भी है। वह किसी भी राष्ट्रविरोधी गति विधि का विरोध करता है जैसा कि एक प्रचलित किंवदंती से साफ नजर आता है कि ब्राह्मण-पुजारी जब अपनी षड्यंत्रकारी नीतियों के तहत कथा आदि का आयोजन करता था तो वह वहाँ पर सबसे पहले यह घोषणा करता था कि कथा में कोई शूद्र समाज का व्यक्ति न बैठा हो। एक बार ऐसी कथा का आयोजन चल रहा था, ब्राह्मण-पुजारी ने अपने नियम के अनुसार घोषणा की कि कोई शूद्र समाज का व्यक्ति कथा में मौजूद नहीं होना चाहिए परंतु वहाँ पर एक चमार जाति का व्यक्ति मौजूद था जो ब्राह्मण-पुजारी की घोषणा को सुनकर भी वहाँ पर चुपचाप बैठा रहा। पुजारी ने कथा की शुरूआत की और वहाँ पर बैठे भक्तों से कहा जब कृष्ण जी रथ पर बैठकर चलते थे तो रथ के पहिये आसमान को छूकर चलते थे, वहाँ पर बैठे चमार जाति के व्यक्ति से रुका नहीं गया उसने पुजारी से पूछा कि पंडित जी हमें यह बताओं कि जब पहिये आसमान को छूकर चल रहे थे तो रथ की भुरजी कहाँ थी? यह सुनकर पुजारी समझ गया कि यह कोई यहाँ का मूलनिवासी दलित ही होगा जो अपनी बुद्धि से तर्कवादी प्रश्न कर रहा है। पुजारी ने कथा को रोककर घोषणा की कि इस शूद्र व्यक्ति को कथा से बाहर निकालो क्योकि इसने हमारी कथा को अपवित्र कर दिया है। इस पूरे वृतांत का अभिप्राय यही है कि दलित व पिछड़े समाज के लोग तर्कवादी व सत्यवादी थे, इसलिए उनके मंदिर प्रवेश पर प्रतिबंध भी था ताकि वे ब्राह्मण-पुजारियों की पोल न खोल सकें।
दिल्ली में संघियों का भ्रष्टाचार: दिल्ली में पिछले एक साल से श्रीमती रेखा गुप्ता की सरकार है जिसमें भ्रष्टाचार इस कदर विकराल हो रहा है कि सुबह के समय में सरकार की एक एजेंसी सड़क बनाती है तो शाम को सरकार की दूसरी एजेंसी उसी ताजा बनी सड़क की खुदाई कर देती है। पूरी दिल्ली में इस तरह की खुदाई से जनता परेशान है, सड़कों पर जाम और धूल की समस्या विकराल बनी हुई है। गड्ढों की खुदाई से लोगों की जाने जा रही है। यह सब कुछ भ्रष्टाचार के स्रोत है। भ्रष्टाचार तो इस देश में पहले से ही मौजूद था लेकिन वर्तमान सरकार में भ्रष्टाचार की दर 500 गुना से भी अधिक बढ़ चुकी है और जनता भ्रष्टाचार के कारण त्रस्त है।
चुनाव जितने के लिए भ्रष्टाचार का खुला खेल: पूरा देश देख रहा है कि जिस प्रदेश में भी चुनाव होने वाले होते है वहाँ-वहाँ पर संघी सरकारें मुफ्त की रेबड़िया बांटने का खुला भ्रष्टाचारी खेल शुरू कर देती है। पिछले दिनों बिहार में विधान सभा का चुनाव हुआ, वहाँ पर मोदी के संघी सहयोगियों ने प्रति महिला वोटर को 10 हजार रुपए देकर भ्रष्टाचार का खुला खेल खेला। जिसका देश के चुनाव आयोग और न किसी न्यायपालिका ने संज्ञान लिया। जिसके कारण मोदी संघी सरकार बिहार में जीत पाई। इस प्रक्रिया से मोदी संघी मानसिकता के लोग देश के लोकतंत्र को ध्वस्त करने में लगे हैं। देश की जागरूक जनता को इसका संज्ञान लेना चाहिए और ऐसी मोदी संघी सरकारों को देश से जल्द से जल्द भगाना चाहिए।
चुनाव आयोग के सहयोग से चुनाव जितने का चल रहा खेल: देश में प्रजातंत्र के तहत 5 साल के उपरांत चुनाव कराने की व्यवस्था है, इसके अलावा मध्यावधि चुनाव भी हो सकते हैं। इन चुनावों के माध्यम से मोदी संघी सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त संघी मानसिकता के कार्यकर्ता व अधिकारियों को चुनाव में उतारकर चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता को धूमिल कर रही है। पिछले साल दिल्ली की विधान सभा चुनाव में खुले तौर पर देखा गया कि मतदाताओं को खुले रूप में 500 व 1000 रुपए बांटकर वोट खरीदे गये थे, यह सब देखकर भी देश की प्रशासनिक व संवैधानिक संस्थाएं मौन रहीं।
भाजपा के पास चुनावी चंदे के माध्यम से अधिक धन क्यों और कैसे आया: इस अकूत धन का स्रोत भ्रष्टाचार ही है चुनावी चंदे के नाम पर भाजपा को यहाँ की व्यापारी संस्थाओं ने जो धन दिया वह रिश्वत का एक बदला हुआ रूप था। जिसके बदले में मोदी-संघी सरकार ने फार्मा कंपनियों की नकली दवाइयों को भी बाजार में बिकवाया। मोदी संघी व्यापारियों ने मौजूदा सरकार से जो अवैध फायदा उठाया है उन्होंने उसकी भारी कीमत भाजपा को छिपे रूप में धन देकर चुकाई है। जिसका साक्ष्य देश के सामने है कि भाजपा के पास हर राज्य में पार्टी के बड़े-बड़े राजशाही कार्यालय हैं। देश की भोली-भाली जनता को इसे समझने की जरूरत है और मोदी संघी सरकार को देश से उखाड़कर फेंकना है।
देश के राजा, पुरोहित व व्यापारी भ्रष्टाचार के प्रेरक व अग्रणीय: किसी भी तरह का भ्रष्टाचार, किसी भी देश में बिना राजा, पुरोहितों और व्यापारी वर्ग की मिलीभगत के बिना नहीं हो सकता। देश में आजादी के बाद से जितने भी भ्रष्टाचार के घोटाले सामने आए हैं उन सभी में परोक्ष रूप से सरकार और प्रत्यक्ष रूप से पुजारी और व्यापारी ही शामिल रहे हैं, बिना इनके शामिल हुए कोई भी भ्रष्टाचार हो नहीं सकता। देश की जनता के सामने आज जहां-जहां पर डबल इंजन की सरकारें हैं वहाँ-वहाँ पर भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं रह गई है। जनता का कोई भी काम बिना रिश्वत दिये नहीं हो रहा है और रिश्वत देने के बाद भी काम की कोई गारंटी नहीं होती है। भ्रष्टाचार को संगठित और केन्द्रीकृत रूप से चलाने के लिए मोदी-संघी सरकारों ने हर सरकारी संस्थान और दफ्तर में अपना एक संघी मानसिकता का व्यक्ति स्थापित किया हुआ है जिसके अनुसंशा के बिना कोई भी कार्य आगे नहीं बढ़ सकता और अगर काम के बदले में पैसा भी लेना है तो वह पैसा भी उसी व्यक्ति के माध्यम से पिछले दरवाजे से दिया जाता है और काम हो जाता है। इस प्रकार कह सकते हैं कि मोदी संघी सरकार ने जो इस देश की जनता से वायदा किया था कि ‘‘मैं न खाऊँगा और न किसी को खाने दूंगा’’ वह आज पुरी तरह से फेल होकर जनता को दिख रहा है कि भ्रष्टाचार पिछली सरकारों के मुकाबले में इस सरकार में कई हजार गुना बढ़ चुका है। देश में विकास का जो ढ़ोल पिटा जा रहा है वह खोखला होकर जनता के सामने हर रोज आ रहा है। मोदी संघी सरकार का भ्रष्टाचार देश के विकास को भष्मासुर की तरह खा रहा है। आज तक की सभी सरकारों में मोदी-संघी शासन सबसे अधिक भ्रष्ट साबित हो रहा है।





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