




2026-01-31 15:10:26
नई दिल्ली। गुरुवार को देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यूजीसी के ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ के नाम पर लाए गए 2026 के विनियमों पर रोक लगाना कोई साधारण न्यायिक आदेश नहीं है। यह उस गहरी साजिÞश का संकेत है, जिसकी तरफ हम लगातार इशारा करते रहे हैं।
न्यायालय ने साफ कहा है कि ये विनियम प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं, दुरुपयोग योग्य हैं और सामान्य वर्गों के प्रति भेदभावपूर्ण प्रतीत होते हैं। यानी समानता के नाम पर असमानता थोपने की कोशिश! जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ही पिछले फैसले में साल 2012 के विनियम को अपर्याप्त मानकर नये प्रावधान बनाने का आदेश दिया था। और इससे भी गंभीर बात यह कि अदालत ने खुद सुझाव दिया कि इन विनियमों की समीक्षा प्रतिष्ठित न्यायविदों की समिति करे। इसका मतलब साफ है—सरकार और यूजीसी ने बिना पर्याप्त संवैधानिक विवेक के, बिना सामाजिक सहमति के, नियम थोपने की जल्दबाजी की।
इंदिरा जयसिंह की टिप्पणी बेहद अहम है—‘आप कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करें और फिर अदालत से रोक लगाने की मांग करें, यह स्वीकार्य नहीं है।’
यही तो पूरा खेल है। पहले सामाजिक तनाव पैदा करो, फिर न्यायपालिका की आड़ में अपने ही बनाए नियमों से पल्ला झाड़ लो। यह महज एक प्रशासनिक चूक नहीं है, यह एक सोची-समझी चाल है। बहुजन समाज को उलझाने की, आरक्षण और सामाजिक न्याय की बहस को कमजोर करने की, और ‘समानता’ जैसे शब्दों के पीछे छिपकर वर्चस्व को सुरक्षित रखने की चाल। बहुजनों! अब भ्रम में रहने का समय नहीं है। अब सफाई देने का नहीं, सवाल पूछने का समय है। अब चुप रहने का नहीं, संगठित होकर जवाब देने का समय है।
यह सिर्फ एक विनियम पर रोक नहीं है—यह उस झोल का पर्दाफाश है, जिसे बहुत पहले से ढका जा रहा था। और याद रखिए जो समाज समय रहते नहीं जागता, उसके हक हमेशा नियमों की भाषा में छीने जाते हैं।
अब जागना होगा। वरना अगली बार ‘समानता’ शब्द ही हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा।





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