




2026-11-02 16:59:14
नई दिल्ली। देश के लोकतांत्रिक ढांचे और जनपक्षीय आवाजों पर पिछले कुछ वर्षों से जो प्रहार चल रहे हैं, उसका सबसे क्रूर और सूक्ष्म रूप अब भारतीय पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों पर दिखाई दे रहा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ताजा आंकड़े किसी भी सजग नागरिक को स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। एक ही वर्ष के भीतर देश में पंजीकृत पत्र-पत्रिकाओं की संख्या में 51.86 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। जहां 2024-25 में देश में 1,54,523 पत्र-पत्रिकाएं पंजीकृत थीं, वहीं 2025-26 में यह संख्या घटकर केवल 74,374 रह गई। यानी महज एक वर्ष में 80 हजार से अधिक प्रकाशनों को एक झटके में सूची से बाहर कर दिया गया। यह महज कोई प्रशासनिक फेरबदल या डेटा क्लीनिंग नहीं है, बल्कि स्वतंत्र विचारों, जन-आंदोलनों और हाशिए के समाजों की वैचारिक रीढ़ तोड़ने की सुनियोजित नीति का दस्तावेज है।
कानूनों की आड़ में दमनकारी शिकंजा: औपनिवेशिक काल के 1867 के कानून को हटाने का ढोल पीटकर लाया गया प्रेस एवं आवधिक प्रकाशनों का पंजीकरण अधिनियम (ढफढ अू३), 2023 आज स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए अभिशाप साबित हो रहा है। इस कानून की धारा 11 का सहारा लेकर 88,000 से अधिक शीर्षकों का पंजीकरण रद्द कर दिया गया। ब्रिटिश हुकूमत ने भी अपने 75 साल के कड़े कानूनों के बावजूद इतनी निर्ममता से पत्रिकाओं का अस्तित्व समाप्त नहीं किया था, जितना आजाद भारत की मौजूदा सत्ता ने एक झटके में कर दिया। नियम-कायदों, सालाना विवरणियों और कठोर तकनीकी शर्तों का ऐसा मकड़जाल बुना गया है जिसमें कॉरपोरेट मीडिया घराने तो वकीलों और संसाधनों के दम पर तैर जाते हैं, लेकिन अपनी जेब से पैसा लगाकर निकलने वाली लघु और पाक्षिक-मासिक पत्रिकाएं घुट-घुट कर दम तोड़ देती हैं।
वंचितों की आवाज पर सीधा हमला: आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि इस तलवार की धार किस पर चली है। हिंदी जैसी प्रमुख भाषा में पंजीकृत प्रकाशनों की संख्या चार वर्षों में 56,052 से गिरकर 33,491 पर आ गई, वहीं अंग्रेजी में यह 19,929 से घटकर सिर्फ 6,430 रह गई। सबसे दर्दनाक स्थिति क्षेत्रीय और लोक भाषाओं की है। संथाली जैसी आदिवासी भाषा में पंजीकृत प्रकाशन 23 से घटकर मात्र 6 रह गए हैं। बंगाली में 5,060 से घटकर 1,162 और मराठी में 10,380 से घटकर 6,664 रह गए। यह केवल संख्याओं का खेल नहीं है; यह उस विचार-प्रवाह का संहार है जो दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक, आदिवासी और महिला विमर्श को जमीन से उठाकर संवाद के केंद्र में लाता था। लघु पत्रिकाएं कभी चुनावी लाभ या व्यावसायिक मुनाफे के लिए नहीं निकलीं। वे फुले, आम्बेडकर, पेरियार और भगत सिंह के विचारों को गांव-कस्बों तक पहुंचाने का माध्यम थीं। उन्हें योजनाबद्ध तरीके से समाप्त कर केवल सत्ता-पोषित मुख्यधारा के गोदी मीडिया का एकाधिकार स्थापित किया जा रहा है।
वितरण और डाक व्यवस्था का गला घोंटना: प्रकाशनों को मारने के लिए सरकार ने दोतरफा रणनीति अपनाई है—एक तरफ कागजी पंजीकरण रद्द करना, और दूसरी तरफ उनके वितरण तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त कर देना। विश्वविद्यालयों, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों से किताबों-पत्रिकाओं के स्टॉल लगभग गायब कर दिए गए हैं। बचे-खुचे प्रकाशनों के लिए डाक सेवा ही एकमात्र सहारा थी। लेकिन पोस्ट आॅफिस रेगुलेशंस, 2024 लाकर अखबार की परिभाषा को केवल दैनिक और साप्ताहिक तक सीमित कर दिया गया।
मासिक, त्रैमासिक और अर्धवार्षिक पत्रिकाओं को रियायती डाक दरों से बाहर करने की तैयारी है। 50 पैसे में जाने वाली पत्रिका पर सीधे चार रुपये का टिकट थोप देना उस लघु प्रकाशक की कमर तोड़ने जैसा है, जो चंदा जोड़कर 500 या 1000 प्रतियां छापता है। 2027 तक पोस्टल लाइसेंस को समाप्त करने की तैयारी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सत्ता किसी भी ऐसी सामग्री को पाठक तक पहुंचने ही नहीं देना चाहती जो उसकी वैचारिक चापलूसी न करती हो।
कॉरपोरेट विज्ञापन नीति बनाम लघु पत्रिकाओं का सूखा: आजादी के बाद से ही लघु पत्रिकाओं को सरकारी विज्ञापनों का एक हिस्सा देने की नीति इसलिए थी ताकि लोकतांत्रिक विमर्श जिंदा रहे। शीला दीक्षित के समय दिल्ली में भी इसके लिए नियम बने थे। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में विज्ञापनों का पूरा बजट उन चंद बड़े कॉरपोरेट टीवी चैनलों और अखबारों की झोली में डाल दिया गया है जो दिन-रात सत्ता का गुणगान और सामाजिक विभाजन का काम करते हैं। लघु पत्रिकाओं के लिए कागज के दाम, प्रिंटिंग की लागत, जीएसटी और विज्ञापन का सूखा मिलकर उन्हें आर्थिक आत्महत्या की ओर धकेल रहे हैं।
एक रंग, एक विचार थोपने की अधिनायकवादी मंशा: आरएसएस और वर्तमान केंद्र सरकार की वैचारिक बुनियाद विविधता के बजाय एक विचार, एक भाषा और एक रंग पर टिकी है। लघु पत्रिकाओं का आंदोलन स्वभाव से ही विद्रोही, सवाल पूछने वाला और सत्ता विरोधी रहा है। जब देश में आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी, तब पत्रिकाओं ने जनचेतना जगाई थी। आज के दौर में जब मुख्यधारा का मीडिया पूरी तरह नतमस्तक हो चुका है, तब ये छोटी-छोटी पत्रिकाएं ही सत्ता के झूठ को बेनकाब करने का अंतिम मोर्चा थीं।
80 हजार से अधिक पत्रिकाओं को बंद कर देना और आगे 30 हजार को निशाने पर रखना इस बात का खुला प्रमाण है कि मौजूदा निजाम को असहमति के किसी भी स्वर से भय लगता है। यदि साहित्यिक, वैचारिक और सामाजिक पत्रिकाओं की यह समृद्ध परंपरा नष्ट हो गई, तो भारत का लोकतंत्र केवल कागजों पर रह जाएगा और समाज उस बौद्धिक बंजरता की ओर चला जाएगा जहाँ सवाल पूछना अपराध बन जाता है। इस सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक विनाश के खिलाफ देश के सभी लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को एकजुट होकर आवाज उठानी होगी।





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