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शैक्षिक संस्थानों में शामिल किया जा रहा ‘आसएसएस’ का एजेंडा

News

2026-08-22 15:19:17

नई दिल्ली। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा कक्षा 11 और 12 के राजनीति विज्ञान (पॉलिटिकल साइंस) की पाठ्यपुस्तकों के निर्माण हेतु गठित नए पैनल ने देश के अकादमिक और राजनीतिक गलियारों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। शिक्षा को निष्पक्ष, समावेशी और वैज्ञानिक चेतना से युक्त रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी के उलट, नई टीम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से वैचारिक रूप से जुड़े कम से कम चार प्रमुख सदस्यों की मौजूदगी ने इसे संस्थानों पर वैचारिक कब्जे की बहस में तब्दील कर दिया है। एनसीईआरटी का दायित्व देश की भावी पीढ़ी को एक संतुलित, आलोचनात्मक और बहुलतावादी दृष्टिकोण प्रदान करना है। विशेष रूप से राजनीति विज्ञान जैसे संवेदनशील विषय में, जहां संविधान, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, विविधता और ऐतिहासिक संघर्षों का अध्ययन होता है, किसी एक विशेष राजनीतिक विचारधारा के पैरोकारों की मजबूत उपस्थिति शिक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। अधिसूचना के मुताबिक, पैनल को भारतीय ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव को पाठ्यक्रम में शामिल करने का कार्य सौंपा गया है। आलोचकों का तर्क है कि प्राचीन गौरव और सांस्कृतिक जड़ों की पुनर्स्थापना के नाम पर आधुनिक लोकतांत्रिक विमर्श, सामाजिक न्याय के संघर्ष और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को गौण करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है। पैनल में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के पूर्व पदाधिकारियों और भाजपा के राजनीतिक सलाहकारों के रूप में कार्य कर चुके व्यक्तियों की नियुक्ति यह दर्शाती है कि अकादमिक योग्यता से अधिक प्राथमिकता वैचारिक निष्ठा को दी जा रही है। जब राजनीतिक रणनीतिकार स्कूली बच्चों के लिए नागरिक शास्त्र और राजनीति विज्ञान का पाठ्यक्रम तय करेंगे, तो उससे संतुलित और निष्पक्ष सामग्री की उम्मीद कैसे की जा सकती है? पिछले कुछ वर्षों में एनसीईआरटी की किताबों से चुनिंदा ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक आंदोलनों और संवैधानिक बहसों को हटाने या बदलने के जो प्रयास देखे गए हैं, यह नया पुनर्गठन उसी प्रक्रिया को संस्थागत रूप देने का अगला कदम प्रतीत होता है।

पैनल की संरचना और सदस्यों की पृष्ठभूमि: बराजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री के नेतृत्व वाले इस पैनल में कई ऐसे चेहरे शामिल हैं, जिनका जुड़ाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संघ परिवार और भाजपा की कार्यप्रणाली से रहा है:

यदुनाथ देशपांडे: वर्तमान में शिक्षा मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार हैं। वह एबीवीपी के महाराष्ट्र संयुक्त राज्य संगठन सचिव, मुंबई-कोंकण संगठन सचिव और भाजपा के राजनीतिक सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं।

वंदना मिश्रा: जेएनयू के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में प्रोफेसर हैं और एबीवीपी की पूर्व राष्ट्रीय सचिव रह चुकी हैं।

प्रशांत दिवेकर: पुणे स्थित आरएसएस से संबद्ध संस्था ज्ञान प्रबोधिनी से जुड़े हैं और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में भी योगदान दे चुके हैं।

रवि रामचंद्र शुक्ला: जेएनयू के सेंटर फॉर कंपेरेटिव पॉलिटिक्स एंड पॉलिटिकल थ्योरी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं और आरएसएस से जुड़े इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ डेमोक्रेटिक लीडरशिप-रंभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी तथा इसके जर्नल के संपादकीय बोर्ड से संबद्ध हैं।

इस टीम को नवंबर 2026 तक कक्षा 11 की और जुलाई 2027 तक कक्षा 12 की नई पाठ्यपुस्तक तैयार करने की समय-सीमा दी गई है।

विपक्ष का तीखा हमला: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि व्यक्तियों का शुद्धिकरण पाप है और किताबों का संघीकरण अभिशाप है। राहुल गांधी ने स्पष्ट कहा था कि देश की शिक्षा व्यवस्था तीन बीमारियों—निजीकरण, केंद्रीकरण और संघीकरण—से ग्रसित है। जो एनसीईआरटी ने किया है, वह पिछले 12 वर्षों से लगातार चल रहे उस सिलसिले का हिस्सा है, जहां संस्थाओं पर एक ही विचारधारा को थोपा जा रहा है। वहीं कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने कहा कि आरएसएस-भाजपा हमारे देश की हर संवैधानिक और शैक्षिक संस्था पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं। जब तक जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बड़ा राजनीतिक बदलाव नहीं आता, तब तक शिक्षा व्यवस्था को यह सब झेलना पड़ेगा।

राजद सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि जिन लोगों और संस्थाओं ने व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, उन्हें ही पाठ्यक्रम तय करने का जिम्मा दिया जा रहा है। नई पीढ़ी निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली, रोजगारपरक शिक्षा और समावेशी व्यवस्था चाहती है, न कि किसी खास विचारधारा की ट्रेनिंग। देश के स्वतंत्रता संग्राम और तिरंगे के प्रति संघ के ऐतिहासिक रुख को सब जानते हैं। आज वही संगठन शिक्षा के माध्यम से देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने की कोशिश कर रहा है, जो देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05