




2026-04-25 18:57:21
संवाददाता
नई दिल्ली। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अनुसूचित जाति व अन्य सभी अत्यंत पिछड़े जातीय घटकों के कल्याण व उनका सामाजिक, बौद्धिक स्तर ऊंचा करने के लिए अपनी आखरी सांस तक काम किया। बिना किसी लालच और लालसा के बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया की स्थापना करके राजनैतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले अपने अनुयायियों को समर्पित की थी। लेकिन महाराष्ट्र के महार समाज से जुड़े राजनैतिक आकांक्षा वाले लोगों ने आरपीआई में संघर्ष न करके लुके-छिपे ढंग से तत्कालीन ब्राह्मणवादी कांग्रेस का साथ दिया था। कांग्रेसी नेताओं से साँठ-गांठ करके राजनैतिक लाभ लेने की नियत से वे कांग्रेस के पाले में चले गए थे। महाराष्ट्र के आरपीआई से जुड़े महार नेताओं ने उत्तर भारत के राजनैतिक नेताओं को आरपीआई में कोई विशेष सम्मान नहीं दिया और न उनको उनकी मंशा के अनुरूप कार्य करने दिया गया। जिसका श्रेष्ठतम उदाहरण बुद्धप्रिय मौर्य व अनेकों अम्बेडकरवादी नेताओं का रहा है। मान्य बी.आर. गवई के सीजेआई बनने से पहले ही हम बहुजन समाज के बहुत सारे अधिवक्ताओं से सुन रहे थे कि मान्य बी. आर. गवई जी समाज के लिए एक अच्छे न्यायधीश सिद्ध नहीं होंगे। मगर हमें उनके इस वक्तव्य पर पूरा यकीन नहीं हो पा रहा था परंतु अब उनके इस कृत्य और तस्वीर को देखकर हमारे मन का भ्रम दूर हो गया है। मान्य पूर्व सीजेआई गवई जी एक अच्छे न्यायिक दृष्टिकोण, बुद्धिमत्ता और भगवान बुद्ध के आचरण को आत्मसात करने वाले व्यक्ति कभी नहीं हो सकते। उनके सीजेआई बनने पर समाज के कई लोगों की प्रतिक्रियाएँ थी कि उच्चतम न्यायालय में पहला सच्चा अम्बेडकरवादी मुख्य न्यायधीश बनने जा रहा है। मान्य गवई जी ने भी अपने वक्तव्य में लोगों को बताया था कि मैं जन्म से बौद्ध हूँ और इसलिए मैं बौद्ध धम्म को ही मानता हूँ और उसी के अनुसार आचरण भी करता हूँ।
सीजेआई बी.आर. गवई का बागेश्वर धाम जाना इस बात का प्रमाण है कि ऊंचे पदों पर बैठने से सोच ऊंची नहीं होती। बाबा साहब की वह लाइन-मुझे मेरे पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया-आज भी उतनी ही ताजी और चुभने वाली है। इस संदर्भ में यहाँ यह कहना उचित होगा कि पूर्व सीजेआई बी. आर गवई के पिता माननीय रामकृष्ण सूर्यभान गवई (आर.एस.गवई) भी उनमें से ही एक व्यक्ति है जिन्हें देखकर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने आगरा 18 मार्च 1956 में एक जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि ‘मेरे पढेÞ लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया’। बाबा साहेब के कथन को सत्यापित करते हुए हम यहाँ यह कह सकते हैं कि जैसा बाप था वैसा ही बेटा निकला!
बाबा साहब चाहते थे कि जब हमारा कोई व्यक्ति जज, कलेक्टर या डॉक्टर बने, तो वह समाज के लिए एक ढाल बने। लेकिन आज हो क्या रहा है? लोग पद पाते ही अपनी जाति और संघर्ष को छुपाने लगते हैं या फिर खुद को बड़ा दिखाने के लिए उन्हीं कर्मकांडों में शामिल हो जाते हैं जिन्हें बाबा साहब ने मानसिक गुलामी की जंजीर कहा था। भूषण गवई जैसे लोग जब वहां जाते हैं, तो वे समाज के उस कर्ज को भूल जाते हैं जिसकी बदौलत वे उस कुर्सी तक पहुंचे थे। पूर्व सीजेआई गवई जी ने आरक्षण के मुद्दे पर भारत के उच्चतम न्यायालय में बैठकर अपने फैसले में व्यवस्था दी थी कि आरक्षित वर्ग की पदोन्नति में क्रीमी लेयर का प्रावधान भी लागू होना चाहिए।
बात सिर्फ धाम जाने की नहीं है, बात उस रीढ़ की हड्डी की है जो शिक्षा आने के बाद और मजबूत होनी चाहिए थी, लेकिन वह सत्ता और व्यवस्था के आगे झुक गई। बागेश्वर धाम जाने के पीछे पूर्व सीजेआई की मानसिकता में क्या थी? यह तो उन्हें ही मामूल होगा मगर देखने वाली जनता को और बाबा साहेब व भगवान बुद्ध के अनुयायियों को लगता है कि पूर्व सीजेआई गवई सेवानिवृत होने के बाद भी किसी भी स्तर के पाखंडी का हाथ पकड़कर सत्ता से कुछ लाभ लेने की अपेक्षा रखते हैं।
बाबा साहब ने 18 मार्च 1956 को आगरा में बड़े भारी मन से कहा था-‘मुझे मेरे पढ़े-लिखे लोगों ने धोखा दिया है।’ उन्हें उम्मीद थी कि जब समाज का कोई व्यक्ति पढ़-लिखकर उच्च पदों पर पहुंचेगा, तो वह अंधविश्वास की बेड़ियाँ तोड़ेगा, तर्कवाद की मशाल जलाएगा और अपने पीछे छूट गए करोड़ों शोषित भाईयों के लिए उजाला बनेगा। लेकिन विडंबना देखिए, आज जब कोई व्यक्ति न्यायपालिका के सर्वोच्च शिखर को छूता है, तो वह संविधान की वैज्ञानिक चेतना को भूलकर चमत्कार के दावों के आगे नतमस्तक हो जाता है। पूर्व सीजेआई गवई जी आज उसी कथन का प्रतिबिंब बनते हुए दिख रहे हैं।
बाबा साहब ने जिस वर्णवादी मानसिकता और रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष किया, आज का पढ़ा-लिखा वर्ग उन्हीं संस्थानों की गोद में बैठकर अपनी जड़ों को काट रहा है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज को पढ़े-लिखे नेतृत्व की जरूरत पड़ी, तब-तब एक बड़े वर्ग ने व्यक्तिगत स्वार्थ, मानसिक गुलामी या व्यवस्था के तुष्टीकरण के लिए समर्पण कर दिया। आज भारत की संसद में 131 सांसद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से चुनकर आए हुए बैठे हैं, समाज पर लगातार हो रहे अत्याचारों के खिलाफ न उनमें बोलने की ताकत है और न वर्तमान सरकार की ब्राह्मणवादी नीतियों के सामने तर्क संगत रूप में खड़े होने की क्षमता दिखती है।
धोखा केवल 1956 में नहीं हुआ था, धोखा आज भी हर उस पल हो रहा है जब एक शिक्षित व्यक्ति अपनी तर्कशक्ति को किसी पाखंड के चरणों में रख देता है। आज पूरा समाज अपनी आँखों से देख रहा है और अपनी बुद्धि से आंकलन कर रहा है कि समाज के अधिकांशतया लोग शिक्षित और समृद्ध होने के बाद अपने अम्बेडकरवादी पथ से विचलित हो रहे हैं। वे और उनका परिवार पाखंडवाद में लिप्त होता पाया जा रहा है। जिसे देखकर जिन लोगों ने शिक्षा और सत्ता का लाभ नहीं लिया है। वे अपने ऐसे लोगों को देखकर भ्रमित है कि क्या हमारे समाज के शिक्षित व सम्मानित लोग सही व अम्बेडकरवादी रास्ते पर चल रहे हैं। इसी दुविधा के कारण आज पूरा बहुजन समाज (एससी/एसटी/ओबीसी/अल्पसंख्यक) बिखरा हुआ नजर आ रहा है। साथ ही वह भिन्न-भिन्न राजनैतिक दलों के दरवाजों पर जाकर अपना मूल्य खोज रहा है और अपने समाज के उत्थान व संघर्ष के लिए बिलकुल भी तैयार दिखाई नहीं देता है। निष्कर्ष के तौर पर हम स्पष्ट रूप से समाज को कहना चाहते हैं कि बहुजन समाज के जो लोग उच्च शिक्षित दिखाई देते हैं, उच्च पदों पर आसीन रह चुके हैं, उच्च राजनीतिक पदों पर विराजमान रह चुके हैं। उसे देखकर आप बिलकुल भी प्रभावित व नतमस्तक न हो बल्कि आप सभी से निवेदन है कि आप अपने समाज के व्यक्तियों के आचरण का वास्तविक मूल्यांकन करें और तभी अपने अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचे, बनावटी और दिखावटी बातों में आकर किसी के अंधभक्त न बने।
पाखंड बनाम विज्ञान और संविधान बनाम कर्मकांड
1. तार्किकता का पतन: साक्ष्यों के आसन से पाखंड के दरबार तक
एक न्यायाधीश का पूरा जीवन और करियर साक्ष्यों, तथ्यों और तार्किक विश्लेषण पर टिका होता है। सुप्रीम कोर्ट में कोई भी फैसला भावनाओं या चमत्कार की उम्मीद पर नहीं, बल्कि रूल आॅफ लॉ और ठोस प्रमाणों के आधार पर दिया जाता है। जब उस सर्वोच्च आसन पर बैठ चुका व्यक्ति ऐसे दरबार में पहुँचता है जहाँ बिना किसी वैज्ञानिक आधार के लोगों की बीमारियों, भविष्य और समस्याओं को पर्चे पर लिखकर हल करने का दावा किया जाता है, तो यह सीधा संदेश देता है कि न्याय और तर्क की सर्वोच्च कुर्सी भी अंधविश्वास के आगे बौनी है।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री खुलेआम आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और तार्किक सोच को चुनौती देते रहे हैं। उनका मंच अक्सर अंधविश्वास को बढ़ावा देने और एक विशेष प्रकार के कट्टरपंथी विमर्श (हिन्दूत्व) को पोषित करने का केंद्र रहा है। पूर्व सीजेआई का उस मंच पर मौजूद होना, चाहे वह केवल एक अस्पताल या संस्कृत विद्यालय के समर्थन के नाम पर ही क्यों न हो, उन सभी अतार्किक दावों को एक प्रकार की कानूनी और संस्थागत वैधता प्रदान कर देता है।
2. संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन
भारत का संविधान अनुच्छेद 25 के तहत हर नागरिक को अंत:करण और धर्म को अबाध रूप से मानने की स्वतंत्रता देता है। पूर्व सीजेआई भी इस अधिकार से वंचित नहीं हैं। परंतु, संविधान का ही अनुच्छेद 51ए (एच) प्रत्येक नागरिक (और विशेषकर उच्च पदों पर बैठे लोगों) का यह मौलिक कर्तव्य तय करता है कि वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें। संवैधानिक पदों पर बैठे या रह चुके व्यक्तियों का जीवन केवल व्यक्तिगत नहीं होता। उनकी आॅप्टिक्स (सार्वजनिक छवि) समाज के लिए एक मानक तय करती है। जब एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश चमत्कारों के दरबार में खड़ा होता है, तो वह अनजाने में ही संविधान के अनुच्छेद 51ए (एच) की आत्मा की हत्या कर रहा होता है। यह घटना साबित करती है कि भारत में बड़े से बड़े पद पर बैठा व्यक्ति भी अक्सर अपनी संवैधानिक नैतिकता से ज्यादा अपनी धार्मिक कंडीशनिंग से संचालित होता है।
3. आंबेडकरवादी विरासत पर एक वैचारिक आघात
जस्टिस बी.आर. गवई की पृष्ठभूमि और उनकी पहचान का एक बड़ा हिस्सा डॉ. बी.आर. आंबेडकर के विचारों से जुड़ा रहा है। डॉ. आंबेडकर ने जीवन भर अंधभक्ति, कर्मकांड और मानसिक गुलामी के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ‘भक्ति मार्ग धर्म में तो ठीक हो सकता है, लेकिन राजनीति और सार्वजनिक जीवन में यह पतन का रास्ता है।’
बाबासाहेब ने दलितों और शोषितों को मंदिर जाने या चमत्कारों पर भरोसा करने के बजाय शिक्षा, संगठन और संघर्ष का मार्ग दिखाया था। ऐसे में एक ऐसे न्यायाधीश का बागेश्वर धाम जाना, जिन्हें समाज आंबेडकरवादी विरासत का एक महत्वपूर्ण चेहरा मानता है, एक भयानक वैचारिक पतन है। यह उस शोषित और आम नागरिक के लिए एक गहरा झटका है जो न्यायपालिका और ऐसे प्रतीकात्मक चेहरों में बाबासाहेब की तर्कशीलता की छवि देखता है।
4. बहुजन जनता पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव: ‘अगर जज साहब जा रहे हैं, तो बाबा सच होंगे’
भारत की एक बड़ी आबादी आज भी गरीबी, बेरोजगारी और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं से जूझ रही है। जब राज्य नागरिकों को अच्छी शिक्षा और अस्पताल देने में विफल रहता है, तो आम नागरिक अपनी हताशा में इन चमत्कारी दरबारों की ओर भागता है। धर्म और चमत्कार उनके लिए पेनकिलर (दर्द निवारक) का काम करते हैं।
ऐसे माहौल में जब पूर्व सीजेआई जैसी हस्ती बाबा के दरबार में जाती है, तो आम जनता की नजर में उस बाबा का कद और बड़ा हो जाता है। जो युवा या तार्किक लोग समाज में यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ‘पर्चे से बीमारियां ठीक नहीं होतीं, विज्ञान और अस्पताल से होती हैं,’ उनका संघर्ष और कठिन हो जाता है। अंधभक्त समाज इसी मुलाकात का हवाला देकर तार्किकता को देशद्रोह या पाप साबित करने लगेगा। यह मुलाकात समाज के उस इको-चैंबर को और मजबूत करती है जहाँ तर्क की कोई जगह नहीं बची है।
5. सत्ता, धर्म और न्यायपालिका का खतरनाक गठजोड़
आज के परिवेश में यह समझना भी आवश्यक है कि ऐसे बाबाओं के दरबार केवल धार्मिक स्थल नहीं रह गए हैं; वे पावर सेंटर (सत्ता के केंद्र) बन चुके हैं। बड़े-बड़े राजनेता, नौकरशाह और अब पूर्व न्यायाधीश भी वहां अपनी हाजिरी लगा रहे हैं। यह एक प्रकार का चाटुकारी आध्यात्मवाद है।
जब राजनेता इन दरबारों में जाते हैं, तो उनकी मंशा वोट बैंक को साधना होती है। लेकिन जब एक पूर्व सीजेआई वहां जाते हैं, तो यह न्यायपालिका के गिरते हुए वैचारिक स्तर को दर्शाता है। इससे यह आशंका बलवती होती है कि कहीं न्यायपालिका से जुड़े लोग भी उसी लोकप्रिय नैरेटिव के आगे तो सरेंडर नहीं कर रहे हैं, जो आज सत्ता और बहुसंख्यक राजनीति द्वारा गढ़ा जा रहा है? क्या भारत का एलीट वर्ग भी अब भीड़ की मानसिकता के आगे झुक रहा है?
6. भारत बनाम विश्व: हम कहाँ जा रहे हैं?
अगर हम भारत के भविष्य की तुलना चीन या अन्य विकसित देशों से करें, तो यह घटना हमारे दुर्भाग्य का सबसे सटीक चित्र प्रस्तुत करती है। जब चीन के नेता और एलीट वर्ग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), क्वांटम कंप्यूटिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन पर नीतियां बना रहे हैं, तब भारत का एलीट वर्ग और न्यायपालिका के पूर्व शिखर पुरुष पर्चा निकालने वाले बाबाओं से आशीर्वाद ले रहे हैं।
देश का विकास केवल हाईवे और इमारतों से नहीं होता; वह समाज के बौद्धिक स्तर से होता है। जब देश का ब्रेन ट्रस्ट (बुद्धिजीवी समूह) ही अपनी तार्किक क्षमता खोकर आस्था के अंधकूप में छलांग लगा दे, तो 50 साल का जो अंतर भारत और विकसित देशों के बीच है, वह कभी पाटा नहीं जा सकेगा।
निष्कर्ष: पूर्व सीजेआई बी.आर. गवई की बागेश्वर धाम यात्रा केवल एक सौजन्य भेंट नहीं है। यह भारत की वर्तमान स्थिति का एक कड़वा दर्पण है। यह दिखाती है कि हमारे समाज में सूट और टाई या जज के गाउन के पीछे अभी भी एक ऐसा इंसान छिपा है जो वैज्ञानिक युग में जीने के बावजूद मनुवादी पाखंडी मान्यताओं से मुक्त नहीं हो पाया है।
एक मजबूत लोकतंत्र और प्रगतिशील देश के लिए यह आवश्यक है कि उसके आदर्श विज्ञान, तर्क और संविधान की बात करें। जब रक्षक ही भ्रम के मंच को सुशोभित करने लगें, तो यह तय है कि समाज को मनुवादी मानसिक गुलामी से आजाद कराने की लड़ाई अभी बहुत लंबी है। यह घटना एक चेतावनी है—विशेषकर बहुजन समाज और तार्किक युवाओं के लिए—कि उन्हें अपने विवेक की रक्षा के लिए अब और भी अधिक मुखर होकर खड़ा होना पड़ेगा। जब तक आस्था को संविधान और विज्ञान की कसौटी पर परखने का साहस नहीं आएगा, तब तक भारत एक महान अतीत की कहानियों में उलझा रहेगा और एक मजबूत भविष्य का निर्माण केवल एक भ्रम बना रहेगा।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |