




2026-04-11 16:51:30
नई दिल्ली। भारत में आज दो ही ‘वाद’ मजबूती के साथ जमीन पर दिख रहे हैं, पहला है अम्बेडकरवाद और दूसरा ब्राह्मणवाद। इन दोनों ‘वादों’ का आपस में छत्तीस का आंकड़ा है। जिसका प्रमुख कारण दोनों की वैचारिकी में अंतर का होना है। अम्बेडकरवाद समता, समानता, न्याय, बंधुता और सभी प्रकार के न्यायवादी अधिकारों के साथ खड़ा है जबकि ब्राह्मणवाद सभी मनुष्यों में भेदभाव, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद और महिला-पुरुषों के अधिकारों में असमानता को कठोर रूप से प्रतिपादित करता है। संक्षेप में कहें तो ब्राह्मणवाद मानवता विरोधी, जातिवाद और वर्णवाद का समर्थक है, ब्राह्मणवाद का मूल ग्रंथ मनुस्मृति है और वह उसी के विधान के तहत कार्य करता है। ब्राह्मणवाद को मानने वाले लोग मनुस्मृति के समर्थक हैं। हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले राजनैतिक संगठन जैसे संघी भाजपा और कुछ हद तक कांग्रेस व अन्य दल भी मनुस्मृति और सामंतवादी विचारधारा से संक्रमित हैं। जिसके आधार पर वे सामाजिक न्याय के विरुद्ध खड़े होकर संघी मानसिक के राजनीति संगठनों को समर्थन करते हुए दिखते हैं।
भारत का दलित (एससी/एसटी) कहे जाने वाले समाज के चरित्र को पिछले 70-75 वर्षों के अनुभव को देखकर लगता है कि समाज के सभी युवा और वरिष्ठ व्यक्ति सिर्फ 14 अप्रैल को बड़े ही जोश और उमंग के साथ सड़कों पर नजर आते हैं। बड़े-बड़े नारों का उद्घोष करते हुए घूमते हैं, साथ ही गली-मौहल्ले व शहरों में बड़े-बड़े जलूस निकालकर यह प्रदर्शित करते दिखते हैं कि अम्बेडकरवाद के लिए हम मन-तन और कर्म से पूर्ण रूप से समर्पित हैं। यह जोश और उमंग 14 अप्रैल को ही दिखाई देता है, उसके बाद पूरा समाज अगले दिन से ही ब्राह्मणवाद के नशे की चादर ओढ़कर गहरी नींद में सोया हुआ नजर आता है, जो जगाने पर भी नहीं जागता। अगर समाज के कुछेक जागरूक और बुद्धिजीवी लोग अम्बेडकरवादी विषय पर कार्यक्रम करके उन्हें निमंत्रण देकर बुलाते हैं तो उसमें भी ये कथित अम्बेडकरवादी नगण्य संख्या में ही नजर आते हैं, जिसे देखकर ब्राह्मणवाद के समर्थक आसानी से समझ जाते हैं कि कथित अम्बेडकरवादी सिर्फ एक दिन के लिए ही तैयार होते हैं और उसी दिन वे अपनी पूरी शक्ति खर्च करके गहरी नींद में सो जाते हैं। ऐसे अम्बेडकरवादियों के बल पर समाज में कोई स्थायी परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। सामाजिक परिवर्तन के लिए एक सतत: प्रक्रिया के तहत अम्बेडकरवाद को हमेशा भारत भूमि पर स्थापित करने के लिए लगातार सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम चलाते रहने की आवश्यकता है।
महिलाओं की सक्रिय भूमिका अहम: यह देखने में आ रहा है कि एससी/एसटी समुदाय का पुरुष आमतौर पर अपनी जीविका के लिए घर से बाहर जाकर परिश्रम करता है और वह अमूमन उसी दिन या कई दिन बाद घर लौटता है। उसकी अनुपस्थिति में घर को संभालने और चलाने की जिम्मेदारी उस की पत्नी के पास होती है। परिवार के बच्चे भी अपनी माँ के साथ ही रहते हैं, खाते-पीते हैं, सोते हैं और जो संस्कार माँ अपने बच्चों को बचपन की अवस्था में परोसती है वे संस्कार ही बच्चों की अवधारणा में समाहित हो जाते हैं। उसी माँ के द्वारा परोसे गए लक्षणों के आधार पर बच्चे बड़े होकर, उसी के अनुसार आचरण करते हैं। बहुजन समाज की अधिकांश महिलाएं ब्राह्मणवाद से पूरी तरह संक्रमित है। वे रात-दिन ढोलक, सत्संग, कलश-यात्रा व अन्य पाखंडी गतिविधियों में व्यस्त रहती है। जिसके कारण उनके बच्चों में ब्राह्मणवाद ही उनके अंदर समाहित होता रहता है और वे बड़े होकर उसके ही अनुसार आचरण करते हैं। बहुजन समाज के कथित अम्बेडकरवादियों में यह सबसे बड़ी बाधा है कि कहने के लिए तो वे संख्या के आधार पर जनसंख्या का 80-85 प्रतिशत भाग है, लेकिन उनके अंदर पाये जाने वाले सच्चे अम्बेडकरवादी 2-3 प्रतिशत भी मुश्किल से पाये जाये हैं। 2-3 प्रतिशत की आबादी किसी भी सामाजिक परिवर्तन को स्थायी रूप से समाज की भूमि पर कारगर नहीं बना सकती। समाज में स्थायी परिवर्तन लाने के लिए सच्चे अम्बेडकरवादी प्रेरकों की संख्या जनसंख्या के आधार पर 10 प्रतिशत से अधिक होनी चाहिए तभी भारत भूमि पर अम्बेडकरवादी वैचारिकी की गतिशीलता अधिक प्रभावी होकर जमीन पर उतर पाएगी।
यही कारण है कि आज दलित समाज के पुरुषों के अंदर महिलाओं की अपेक्षा अम्बेडकरवाद अधिक जिंदा दिखाई देता है, मगर वह भी अमूमन अक्रियाशील ही रहते हैं, चूंकि न उनके साथ उसके परिवार के बच्चे होते हैं और न समाज का साथ रहता है। अम्बेडकरवाद को भारतभूमि पर कमजोर रखने व उसे धीरे-धीरे खत्म करने के लिए ब्राह्मणवाद भी अधिक सक्रिय होकर परोक्ष रूप से काम करता है और वह कथित अम्बेडकरवादी समाज से उन व्यक्तियों की पहचान करता है जो किसी न किसी लालच और बहकावे में आकर अम्बेडकरवाद के पथ से विचलित होकर अम्बेडकरवाद विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। ब्राह्मणवाद ऐसे व्यक्तियों की तलाश करके उन्हें अम्बेडकरवाद के विरुद्ध षड्यंत्रकारी गतिविधियों में शामिल करने के लिए आवश्यक धन राशि व अन्य संसाधन भी उपलब्ध कराते हैं। आज विडम्बना यह है कि संविधान के लागू होने के 75 वर्षों के बाद भी समग्र रूप से दलित समाज न जागरूक हो पाया है और न अपेक्षा के अनुरूप शिक्षित और मानसिक रूप से समृद्ध हो पाया है। इसका कारण भी समाज के परिवेश में महिलाओं का मनुवादी और ब्राह्मणवादी प्रभाव है। समाज की महिलाएं आज भी आए दिन ब्राह्मणवादी सत्संगों, कथावाचकों, कलश यात्राओं, भंडारों आदि में लिप्त होकर और मुफ्त में राशन-पानी लेकर ब्राह्मणवाद के ही गीत गाती नजर आ रही है।
महिलाओं में अम्बेडकरवाद की अधिक आवश्यकता: दलित समाज की महिलाओं में आज अम्बेडकरवाद को आत्मसात करने और उसी के अनुसार आचरण करने की अधिक आवश्यकता है। अगर समाज की महिलाएं ऐसा करने में सक्षम हो पाती है, तो फिर समाज में अम्बेडकरवाद अधिक तेज गति से स्थापित हो सकेगा। साथ ही समाज में पहले से स्थापित चल रहा ब्राह्मणवाद उसी के अनुपात में कम होकर धीरे-धीरे भारत भूमि से समाप्ति की और बढ़ पाएगा, जो सच्चे अम्बेडकरवादियों का अंतिम लक्ष्य और दृढ़ संकल्प होना चाहिए। पूरे देश की महिलाएं इस बात से अवगत है कि ब्राह्मणवादी मानसिकता के अलम्बरदारों ने महिलाओं को हमेशा ही अपने पैर की जूती समझा उनके मानवीय अधिकारों को भी सीमित ही रखा, साथ ही ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने महिलाओं को कभी भी बराबरी के हक और अधिकार नहीं दिये। देश में सबसे पहले सभी मानवीय और बराबरी के अधिकार भगवान बुद्ध से शुरू होकर और सम्राट अशोक से आते हुए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के समय तक आते हैं। इतिहास के इन महान मानवतावादी प्रतिभाओं ने महिलाओं के अधिकारों को सभी प्रकार के हक अधिकारों को पुरुषों के बराबर ही रखा, बल्कि उन्होंने महिलाओं को सामाजिक परिवर्तन के लिए समाज की रीढ़ बताया और उसी आधार पर महिलाओं को मान और सम्मान दिया गया। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष रहते हुए महिलाओं को संविधान में सभी अधिकार पुरुषों व अन्यों के बराबर ही रखे जबकि ब्राह्मणवादी मानसिकता के संघी लोग उनके द्वारा हिन्दू कोड बिल में प्रतिपादित किए गए अधिकारों का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का विरोध देशभर में आडंबरवादी काल्पनिक देवी-देवताओं का सहारा लेकर महिलाओं का विरोध कर रहे थे और मनुस्मृति का समर्थन कर रहे थे। मनुस्मृति कुटिल षड्यंत्रकारी मानसिकता के ब्राह्मणों द्वारा रचित एक पुस्तक है, जिसमें देश के दलितों और महिलाओं के लिए नीचता की सभी हदें पार की हुई है। उसी का गुणगान करके ब्राह्मणवादी लोग अपने को श्रेष्ठ भी मानते हैं। भारत की सभी जातीय घटकों की महिलाओं को ब्राह्मणवादी मानसिकता की पुस्तक मनुस्मृति को पढ़कर उसका पुरजोर विरोध करना चाहिए। इसके विरुद्ध देश भर की सभी महिलाओं को इकट्ठा होकर निर्णायक जंग छेड़नी चाहिए। वर्तमान समय में भारत के उच्चतम न्यायालय में सबरीमाला केस की सुनवाई चल रही है जिसमें देश के सर्वोच्च कानूनी अधिकारी तुषार मेहता दलील दे रहे है कि उच्चतम न्यायालय को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। धार्मिक अधिकारों की समीक्षा भी नहीं करनी चाहिए, चूंकि अदालतों में बैठे न्यायाधीश धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ नहीं है। इसलिए सबरीमाला केस में जो प्रतिबंधित किया गया है वह सभी धार्मिक और कानूनी दृष्टिकोण से सही है। देश की बहुजन जागरूक जनता तुषार मेहता जी को बता देना चाहती है कि भारतीय संविधान में दिये गए महिलाओं के अधिकारों को न सीमित किया जा सकता है और न धर्म की आड़ लेकर महिलाओं को कुछ दिनों के लिए अछूत बनाया जा सकता है। तुषार मेहता जी के तर्क सभी प्रकार से असंवैधानिक और अतार्किक है इसलिए बहुजन समाज का दृष्टिकोण है कि तुषार मेहता जी के तर्कों को नकारकर संवैधानिक और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सही आंकलन करके अपना फैसला सुनाना चाहिए।
समाज की एकता और शक्ति को कमजोर कर रहे मनुवादी दलित: वर्तमान समय में देखने को मिल रहा है कि दलित (एससी/एसटी व अत्यंत पिछड़ी जातियां) समाज में मनुवादी मानसिकता के लोगों की अधिक बढ़ोत्तरी हो रही है। मनुवादी दलित हैं कौन, पहले इसे समझना आवश्यक है? मनुवादी दलित वे लोग हैं जो मनुवादी वैचारिकी में विश्वास रखते हैं और उसी के अनुसार आचरण करते हैं। मनुवादी व्यवस्था का निर्माण ब्राह्मणवादी मानसिकता से हुआ। जिस समाज में मनुष्य-मनुष्य में भेद, आपस में क्रमिक ऊंच-नीच और जातीय आधारित श्रेष्ठता का भाव है। साथ ही सामाजिक सरोकारों में भी जाति के आधार पर भिन्नता है, जो दलित व्यक्ति अपने आचरण में इसी मानसिकता के आधार पर आचरण और व्यवहार करता है वह मनुवादी दलित है। आमतौर पर आज यह देखा जा रहा है कि समाज के लाखों सामाजिक संगठन मौजूद है परंतु इन सभी संगठनों के संचालक मूल रूप से मनुवादी मानसिकता से ओत-प्रोत दिखते हैं। जिनका मुख्य उद्देश्य अपने राजनैतिक लाभ के लिए स्वयं को समाज में चमकाना और स्थापित करना होता है। सामाजिक संगठनों के अधिकांश नेतृत्वकर्ता सत्ता में बैठे मनुवादी मानसिकता के क्षत्रपों के गुलाम बनकर काम कर रहे हैं, जिनका मूल उद्देश्य समाज को मजबूत करना नहीं, बल्कि उनका मूल मकसद अपने क्षत्रपों और उनकी विचारधारा को मजबूत करना होता है। उदाहरण के तौर पर आज भारत की संसद में 131 सांसद दलित समुदाय (एससी, एसटी) से चुनकर आते हैं, चाहे वे किसी भी राजनीति दल से संबंधित हो। परंतु समाज के ऊपर बढ़ते अत्याचार व उत्पीड़न को देखकर उनमें एकता के साथ अपनी आवाज को बुलंद करने का साहस नहीं होता। चूंकि उनकी मानसिकता में गहराई तक मनुवादी व्यवस्था पहले से ही स्थापित है। इसलिए समाज इस मनुवादी षड्यंत्र को समझे और संकल्प लें कि समाज के ऐसे व्यक्तियों को न हम वोट देंगे और न उनके कहने पर किसी भी राजनीति दल को समर्थन देंगे।
दलित मनुवादियों से समाज कैसे रहे सावधान? आज के समय में सच्चे अम्बेडकरवादियों को दलित मनुवादियों से अधिक सावधान रहने की जरूरत है। चूंकि दलित मनुवादी आस्तीन का साँप बनकर समाज के लिए निरंतरता के साथ खतरा बने रहते हैं। भोला-भाला दलित समाज इन आस्तीन रूपी सांपों से अनभिज्ञ रहकर उनके द्वारा छिपकर किए जा रहे नुकसान और उत्पीड़न को झेलने के लिए मजबूर हो जाता है। इसलिए दलित मनुवादियों को पहचानकर अपने आपको समाज हित में सुरक्षित रखना चाहिए, सच्चे अम्बेडकरवादियों के लिए समाज ही सर्वोपरि रहता है वे किसी भी स्थिति में मनुवादी मानसिकता के क्षत्रपों व आकाओं से कोई समझौता नहीं करते। जिस तरह बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अनेकों तिरस्कार और उत्पीड़न झेलकर, कठिन से कठिन समय में भी समाज को सर्वोपरि रखा और अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए मनुवादी मानसिकता के सवर्ण व अन्य समुदायों से कोई समझौता नहीं किया। बाबा साहेब ने दलित समाज के हितों के लिए अपने द्वारा निर्मित किये गए घर, परिवार को छोड़कर दूर रहना स्वीकार किया लेकिन किसी भी कीमत पर मनुवादी व्यवस्था या लालच को नहीं अपनाया। हम सभी कथित अम्बेडकरवादियों का यह कर्तव्य बनता है कि अगर हम बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हंै तो उनके द्वारा अपनाए गए आचरण व संस्कारों को भी सअक्षर आत्मसात करके उनका अनुसरण करें और देश में अम्बेडकरवाद को मजबूत करने का दृढ़ संकल्प लें।
महिलाओं में अम्बेडकरवाद की अधिक आवश्यकता: दलित समाज की महिलाओं में आज अम्बेडकरवाद को आत्मसात करने और उसी के अनुसार आचरण करने की अधिक आवश्यकता है। अगर समाज की महिलाएं ऐसा करने में सक्षम हो पाती है, तो फिर समाज में अम्बेडकरवाद अधिक तेज गति से स्थापित हो सकेगा। साथ ही समाज में पहले से स्थापित चल रहा ब्राह्मणवाद उसी के अनुपात में कम होकर धीरे-धीरे भारत भूमि से समाप्ति की और बढ़ पाएगा, जो सच्चे अम्बेडकरवादियों का अंतिम लक्ष्य और दृढ़ संकल्प होना चाहिए। पूरे देश की महिलाएं इस बात से अवगत है कि ब्राह्मणवादी मानसिकता के अलम्बरदारों ने महिलाओं को हमेशा ही अपने पैर की जूती समझा उनके मानवीय अधिकारों को भी सीमित ही रखा, साथ ही ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने महिलाओं को कभी भी बराबरी के हक और अधिकार नहीं दिये। देश में सबसे पहले सभी मानवीय और बराबरी के अधिकार भगवान बुद्ध से शुरू होकर और सम्राट अशोक से आते हुए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के समय तक आते हैं। इतिहास के इन महान मानवतावादी प्रतिभाओं ने महिलाओं के अधिकारों को सभी प्रकार के हक अधिकारों को पुरुषों के बराबर ही रखा, बल्कि उन्होंने महिलाओं को सामाजिक परिवर्तन के लिए समाज की रीढ़ बताया और उसी आधार पर महिलाओं को मान और सम्मान दिया गया। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में संविधान प्रारूप समिति का अध्यक्ष रहते हुए महिलाओं को संविधान में सभी अधिकार पुरुषों व अन्यों के बराबर ही रखे जबकि ब्राह्मणवादी मानसिकता के संघी लोग उनके द्वारा हिन्दू कोड बिल में प्रतिपादित किए गए अधिकारों का विरोध कर रहे थे। इतना ही नहीं ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का विरोध देशभर में आडंबरवादी काल्पनिक देवी-देवताओं का सहारा लेकर महिलाओं का विरोध कर रहे थे और मनुस्मृति का समर्थन कर रहे थे। मनुस्मृति कुटिल षड्यंत्रकारी मानसिकता के ब्राह्मणों द्वारा रचित एक पुस्तक है, जिसमें देश के दलितों और महिलाओं के लिए नीचता की सभी हदें पार की हुई है। उसी का गुणगान करके ब्राह्मणवादी लोग अपने को श्रेष्ठ भी मानते हैं। भारत की सभी जातीय घटकों की महिलाओं को ब्राह्मणवादी मानसिकता की पुस्तक मनुस्मृति को पढ़कर उसका पुरजोर विरोध करना चाहिए। इसके विरुद्ध देश भर की सभी महिलाओं को इकट्ठा होकर निर्णायक जंग छेड़नी चाहिए। वर्तमान समय में भारत के उच्चतम न्यायालय में सबरीमाला केस की सुनवाई चल रही है जिसमें देश के सर्वोच्च कानूनी अधिकारी तुषार मेहता दलील दे रहे है कि उच्चतम न्यायालय को धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। धार्मिक अधिकारों की समीक्षा भी नहीं करनी चाहिए, चूंकि अदालतों में बैठे न्यायाधीश धार्मिक मामलों के विशेषज्ञ नहीं है। इसलिए सबरीमाला केस में जो प्रतिबंधित किया गया है वह सभी धार्मिक और कानूनी दृष्टिकोण से सही है। देश की बहुजन जागरूक जनता तुषार मेहता जी को बता देना चाहती है कि भारतीय संविधान में दिये गए महिलाओं के अधिकारों को न सीमित किया जा सकता है और न धर्म की आड़ लेकर महिलाओं को कुछ दिनों के लिए अछूत बनाया जा सकता है। तुषार मेहता जी के तर्क सभी प्रकार से असंवैधानिक और अतार्किक है इसलिए बहुजन समाज का दृष्टिकोण है कि तुषार मेहता जी के तर्कों को नकारकर संवैधानिक और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सही आंकलन करके अपना फैसला सुनाना चाहिए।
समाज की एकता और शक्ति को कमजोर कर रहे मनुवादी दलित: वर्तमान समय में देखने को मिल रहा है कि दलित (एससी/एसटी व अत्यंत पिछड़ी जातियां) समाज में मनुवादी मानसिकता के लोगों की अधिक बढ़ोत्तरी हो रही है। मनुवादी दलित हैं कौन, पहले इसे समझना आवश्यक है? मनुवादी दलित वे लोग हैं जो मनुवादी वैचारिकी में विश्वास रखते हैं और उसी के अनुसार आचरण करते हैं। मनुवादी व्यवस्था का निर्माण ब्राह्मणवादी मानसिकता से हुआ। जिस समाज में मनुष्य-मनुष्य में भेद, आपस में क्रमिक ऊंच-नीच और जातीय आधारित श्रेष्ठता का भाव है। साथ ही सामाजिक सरोकारों में भी जाति के आधार पर भिन्नता है, जो दलित व्यक्ति अपने आचरण में इसी मानसिकता के आधार पर आचरण और व्यवहार करता है वह मनुवादी दलित है। आमतौर पर आज यह देखा जा रहा है कि समाज के लाखों सामाजिक संगठन मौजूद है परंतु इन सभी संगठनों के संचालक मूल रूप से मनुवादी मानसिकता से ओत-प्रोत दिखते हैं। जिनका मुख्य उद्देश्य अपने राजनैतिक लाभ के लिए स्वयं को समाज में चमकाना और स्थापित करना होता है। सामाजिक संगठनों के अधिकांश नेतृत्वकर्ता सत्ता में बैठे मनुवादी मानसिकता के क्षत्रपों के गुलाम बनकर काम कर रहे हैं, जिनका मूल उद्देश्य समाज को मजबूत करना नहीं, बल्कि उनका मूल मकसद अपने क्षत्रपों और उनकी विचारधारा को मजबूत करना होता है। उदाहरण के तौर पर आज भारत की संसद में 131 सांसद दलित समुदाय (एससी, एसटी) से चुनकर आते हैं, चाहे वे किसी भी राजनीति दल से संबंधित हो। परंतु समाज के ऊपर बढ़ते अत्याचार व उत्पीड़न को देखकर उनमें एकता के साथ अपनी आवाज को बुलंद करने का साहस नहीं होता। चूंकि उनकी मानसिकता में गहराई तक मनुवादी व्यवस्था पहले से ही स्थापित है। इसलिए समाज इस मनुवादी षड्यंत्र को समझे और संकल्प लें कि समाज के ऐसे व्यक्तियों को न हम वोट देंगे और न उनके कहने पर किसी भी राजनीति दल को समर्थन देंगे।
दलित मनुवादियों से समाज कैसे रहे सावधान? आज के समय में सच्चे अम्बेडकरवादियों को दलित मनुवादियों से अधिक सावधान रहने की जरूरत है। चूंकि दलित मनुवादी आस्तीन का साँप बनकर समाज के लिए निरंतरता के साथ खतरा बने रहते हैं। भोला-भाला दलित समाज इन आस्तीन रूपी सांपों से अनभिज्ञ रहकर उनके द्वारा छिपकर किए जा रहे नुकसान और उत्पीड़न को झेलने के लिए मजबूर हो जाता है। इसलिए दलित मनुवादियों को पहचानकर अपने आपको समाज हित में सुरक्षित रखना चाहिए, सच्चे अम्बेडकरवादियों के लिए समाज ही सर्वोपरि रहता है वे किसी भी स्थिति में मनुवादी मानसिकता के क्षत्रपों व आकाओं से कोई समझौता नहीं करते। जिस तरह बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अनेकों तिरस्कार और उत्पीड़न झेलकर, कठिन से कठिन समय में भी समाज को सर्वोपरि रखा और अपने व्यक्तिगत फायदे के लिए मनुवादी मानसिकता के सवर्ण व अन्य समुदायों से कोई समझौता नहीं किया। बाबा साहेब ने दलित समाज के हितों के लिए अपने द्वारा निर्मित किये गए घर, परिवार को छोड़कर दूर रहना स्वीकार किया लेकिन किसी भी कीमत पर मनुवादी व्यवस्था या लालच को नहीं अपनाया। हम सभी कथित अम्बेडकरवादियों का यह कर्तव्य बनता है कि अगर हम बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के प्रति सच्ची श्रद्धा रखते हंै तो उनके द्वारा अपनाए गए आचरण व संस्कारों को भी सअक्षर आत्मसात करके उनका अनुसरण करें और देश में अम्बेडकरवाद को मजबूत करने का दृढ़ संकल्प लें।





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