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सामाजिक व राजनैतिक नेताओं में स्वार्थ की पराकाष्ठा

प्रकाश चंद
News

2026-02-14 17:56:33

बहुजन समाज देश में बहुसंख्यक है, जिनकी आबादी करीब 70-75 प्रतिशत आँकी जाती है। इस संख्या में एससी/ एसटी/ ओबीसी/ अल्पसंख्यक आदि समुदाय शामिल है। यह भी सर्वविदित है कि भारतीय समाज विभिन्न जातीय घटकों से मिलकर बना है, जिनकी संख्या 6743 बतायी जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि पूरे समाज में एकता का घोर अभाव है, जिसका मुख्य श्रेय जातिगत क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था को जाता है। एक ही वर्ग के अंदर आने वाली जातियों में क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था ऐसी है कि या तो एक जाति दूसरी जाति से नीची है या ऊंची। इसी क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था के कारण समाज में ब्राह्मणवाद हावी है। ब्राह्मणवाद का अर्थ ब्राह्मण जाति से नहीं है और न ही ब्राह्मणों का नाम लिखने से उनको ऊंचा या नीचा बता रहे हैं। ब्राह्मणवाद उस व्यवस्था का नाम है जिसमें एक व्यक्ति, दूसरे व्यक्ति से या तो ऊंचा माना जाता है या नीचा माना जाता है। शूद्र वर्ग की जातियों में क्रमिक ऊंच नीच की भरमार है। शूद्र वर्ग के अंदर आने वाली एक जाति का व्यक्ति दूसरी जाति के व्यक्ति से अपने आपको ऊंचा या नीचा मानता है तो वह भी ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित है। जब तक समाज के अंदर जाति व्यवस्था और उसमें क्रमिक ऊंच नीच की व्यवस्था बनी रहेगी तब तक समाज में एकता का अभाव भी उसी अनुपात व शक्ति में बना रहेगा।

सामाजिक संगठनों की भरमार: भारत एक जाति प्रधान देश है, यहाँ पर व्यक्ति की पहचान उसकी जाति से मापी जाती है न कि उसके गुणधर्म और योग्यता से मापी जाती है। हर जाति में उस जाति के सामाजिक संगठनों की संख्या एक से अधिक है। कुल मिलाकर 6743 जातियों के सामाजिक संगठन लाखों की संख्या में बने हुए हैं। इन सभी जातीय संगठनों का मुख्य कार्य अपनी ही जाति के अंदर जनजागरण और जागरुता फैलाने, किसी भी सामाजिक प्रताड़ना आदि का विरोध करना साथ में नागरिकों के हितों व अधिकारों की बात करना; समाज को जागरूक करना; समाज के कल्याण के लिए सभी को एकजुट करना; आदि है। इतनी बड़ी संख्या में सामाजिक संगठन होने के बाद भी समाज के अंदर एकता का अभाव है और किसी भी सामाजिक मुद्दे को लेकर सभी का एक साथ खड़े होने का भी अभाव है। जिसका संभावित मुख्य कारण है कि सामाजिक संगठनों के नेता और उनसे जुड़े हुए लोग स्वयं को जनता में बड़ा दिखाने व चमकाने के लिए ही काम करते हंै। कहने के लिए तो ये सामाजिक संगठन है मगर इन्हीं के माध्यम से समाज में राजनीतिक गतिविधियां भी चलाई जाती है। सामाजिक संगठनों का मूल उद्देश्य तो सामाजिक कार्य करना ही था मगर अब धीरे-धीरे से सामाजिक संगठन भी राजनीतिक रंग लेकर राजनीतिक प्लेटफॉर्म में परिवर्तित हो रहे हैं। इन्हीं सामाजिक संगठनों के माध्यम से कुछेक चालाक किस्म के लोग समाज को झांसे में रखकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ भी सेंक रहे हैं। साल 2024 में जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा विस्थापन का आंदोलन चल रहा था तब समाज के कुछेक चालाक और राजनीतिक प्रवृति के लोग इस आंदोलन में शामिल हो गए थे। यह स्वाभाविक ही है कि शुरू में ऐसे व्यक्तियों का पता नहीं ही चलता है, पता तो इन व्यक्तियों का बहुत देर बाद लगता है जब इनका खेल खुलकर सभी के सामने आ जाता है। प्रतिमा विस्थापन के आंदोलन में ऐसा ही हुआ, आंदोलन सुचारु रूप से शुरू तो हुआ, लेकिन बीच में ही राजनीतिक मानसिकता से प्रेरित के. पी. चौधरी, ए.आर. जोशी, राजेन्द्र पाल गौतम, डी. सी. कपिल इत्यादि लोगों ने उसे उसके संघर्ष पथ से विचलित करके सरकार में बैठे भाजपा संघियों के दलालों के साथ साँठ-गांठ करके आम लोगों को बताया गया कि हमारा संघर्ष जारी रहेगा, और बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा वहीं पर लगेगी जहां से उसे विस्थापित किया गया है। लेकिन परिणाम इसके बिलकुल उलटा ही था। चूंकि ये लोग पहले ही भाजपा द्वारा स्थापित किए गए एससी/एसटी कमीशन के चेयरमेन व अध्यक्षों से मिलकर समाज को झांसा दे रहे थे और अंतत: आंदोलन इन लोगों की वजह से विफल हो गया। समाज ने अपने आपको इन लोगों की कार्यशैली और उसके परिणाम को देखकर ठगा सा महसूस किया। पूरा आंदोलन इन लोगों की अंदरूनी रणनीति के कारण विफल हो गया।

संगठनों में बैठाए गए हैं राजनैतिक दलाल: वर्तमान सरकार की रणनीति यह है कि दलित-पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदायों से चालाक व लालची किस्म के लोगों की तलाश करो; उन्हें छोटे-मोटे लालच में फंसाकर दिखावे के लिए उन्हें महत्वपूर्ण दर्शाओ; ऐसे लोगों के माध्यम से समाज की भोली-भाली जनता को अपने पाले में लाओ और उन्हें छोटा-मोटा दाना डालकर यह दिखाओं कि आप सबका कल्याण भाजपा संघी सामाजिक व्यवस्था में ही निहित है। यह प्रक्रिया सरकार के सहयोग से निरंतरता के साथ चल रही है। हाल ही में सुनने को मिला है कि झंडेवालान मंदिर के पास जो संघियों का हेड क्वाटर बना है, उसमें सभी वरिष्ठ संघियों की एक गुप्त मीटिंग हुई जिसमें उन्हें टारगेट दिया गया है कि जहां-जहां पर कमजोर व दलित लोगों की बस्तियाँ है वहाँ-वहाँ पर भंडारे इत्यादि का प्रोग्राम हर रोज चलाते रहने की व्यवस्था करो। उसमें इसी समाज के बच्चे व महिलाओं को अपने कार्यक्रमों में शामिल करो। पूरे इलाके में कलश यात्राएं निकालो, भागवत कथाएँ कराओ और किसी भी तरह इनके बच्चे व महिलाओं को हिन्दुत्व के पाखंड में डुबोकर रखो, ताकि वे धीरे-धीरे इस पाखंड को ही अपना श्रेष्ठतम धर्म समझने लगे। इस प्रकार के सभी कार्यक्रमों को चलाने के लिए भरपूर मात्रा में आवश्यक धन राशि भी दी गई है ताकि निरंतरता और बारंबारता के द्वारा सभी लोग पूर्ण रूप से इस पाखंडी संस्कृति में पक जाएं और अपने समाज का अधिक से अधिक वोट भाजपा की तरफ डलवाने में ये लोग कामयाब हो जाएं। बहुजन समाज के बहुत सारे जातीय घटक इसी कार्य में लगकर इसी को अपना रोजगार मान रहे हैं और पूरे समाज का बड़ी संख्या में वोट ट्रांसफार कराने का दावा भी कर रहे हैं। मकसद साफ है कि अगर दलित समाज का पूरा वोट ट्रांसफार नहीं भी होता है तो फिर भी कम से कम 50-60 प्रतिशत वोट अवश्य ट्रांसफार हो जाएगा। यह कार्य समाज में जोर-शोर से चलाया जा रहा है और समाज के बेरोजगार नवयुवक अपने आपको इस कार्य में लगाकर इसे ही अपना रोजगार समझ रहे हैं। ऐसे ही कई उदाहरण देखने को मिले हैं जैसा ही हाल ही में गाजियाबाद के विजय नगर क्षेत्र से 5-6 लोगों का ग्रुप बहुजन स्वाभिमान संघ के कार्यालय में मिलने को आया और उनमें से एक सुनील कुमार सूर्या, (पूर्व पार्षद) जो बहुजन स्वाभिमान संघ की कार्यकारिणी के सदस्यों से बहस करते हुए दलीले दे रहे थे कि हमें अपने काम निकलवाने के लिए अगर समाज का वोट भाजपा में भी ट्रांसफार कराना पड़े तो कराना चाहिए। उपस्थित बहुजन स्वाभिमान संघ की कार्यकारिणी के सदस्यों ने उनकी इस दलील का तर्कसंगत विरोध किया और उन्हें कड़े शब्दों में बताया कि अगर आपने समाज का वोट ट्रांसफार कराया है तो आपने बहुत बड़ा सामाजिक अपराध किया है।

सामाजिक आंदोलन विफल क्यों? बहुजन समाज के आंदोलन की विफलता का मुख्य कारण है कि इन आंदोलनों में समाज के दुश्मनों (ब्राह्मणवादी) के स्वार्थी लोगों को स्थापित कर दिया जाता है और फिर इन लालची किस्म के कठपुतलियों को सत्ता में बैठे लोग अपने इशारों पर जैसा चलाना चाहते हैं वैसा ही चला सकेंगे। आंदोलन को उसके लक्ष्य से ही भटका देंगे। आंदोलन के भटकने के बाद जब जनता को कोई परिणाम आता दिखाई नहीं देता है तो उससे जुड़ी जनता आंदोलन की गति को देखकर निराश हो जाती है और उसमें शक्ति और जोश की कमी दिखाई देने लगती है। आंदोलन के साथ बैठे समाज के कथित नेता जो सत्ता के इशारे पर प्रदर्शन करके दिखाते है उन्हें अदृश्य रूप से फायदा पहुंचता रहता है। इस तरह दलित-पिछड़े समाज के आंदोलन उनके समुदाय के व्यक्ति द्वारा ही विफल करा दिये जाते हैं। आज देश में हालात ये बन चुके हैं कि दलित पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदाय को जितना खतरा अपने अंदर बैठे हुए विभीषण से है उतना बड़ा खतरा ब्राह्मणवादियों से नहीं है। ब्राह्मणवादियों से दलित-पिछड़ा व अल्पसंख्यक समाज हर कीमत पर निपटने का तैयार रहेगा, मगर जब उनके ही समाज के व्यक्ति समाज के दुशमनों से मिलकर अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ रहे होंगे तो फिर इस अप्रत्यक्ष गौरिल्ला युद्ध में समाज को बिना लड़े ही हार सामने दिखाई देने लगती है।

समाधान: यह समस्या सामाजिक स्तर पर दिन-प्रतिदिन विकराल होती जा रही है तो समाज के जागरूक लोगों को इकट्ठा होकर इस समस्या पर विचार करना चाहिए और विचार-विमर्श के बाद जो विचार सामूहिक रूप से जुझाया जाए उस पर विचार भी करना चाहिए। समाधान बहुत ही सरल तरीके से हो सकता है कि अगर हम सब लोग समाज के सामाजिक संगठनों में बैठे लालची, दलाल व बिकाऊ लोगों की पहचान करके उन्हें चिन्हित कर ले, और समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से इन सभी के नामों को प्रचारित करके समाज को बताएं कि समाज को इन लोगों से सामाजिक हित को ध्यान में रखते हुए सावधान और चौकन्ना रहना होगा। साथ ही उनको यह भी आगाह करें कि इन लोगों को सामाजिक आंदोलनों और संघर्षों से दूर रखना होगा तभी आपका आंदोलन सफल हो सकेगा। ऐसे लोगों की संख्या इसलिए भी बढ़ रही है कि समाज में ऐसे लोगों के मुंह पर उन्हें सीधा नहीं बोला जाता। जब तक समाज ऐसे लोगों के मुंह पर सीधा नहीं नहीं बोलेगा तब तक ये लोग अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे और समाज को छिपे ढंग से धोखा ही देते रहेंगे। इतिहास गवाह है कि ब्राह्मणवादी मनुवादी व्यक्तियों ने हमेशा से इसी रणनीति के तहत काम करके हमारे समाज के महापुरुषों व विद्वानों को ध्वस्त किया है या उनका कत्ल किया है। कभी भी मनुवादी या ब्राह्मणवादी मानसिकता का व्यक्ति हमारे समाज को नुकसान पहुंचाने के लिए सीधे तरीके से सामने नहीं आता है, हमें नुकसान पहुंचाने के लिए वे हमेशा से ही हमारे समाज के किसी लालची व बिकाऊ प्रवृति के व्यक्ति को खरीद लेते हैं और फिर उसी को भेज कर हमारा नुकसान कराने का काम पूरा कराते हैं।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05