




2026-02-14 16:35:33
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि आज के समय में जाति केवल राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मौजूद है, क्योंकि उसका पारंपरिक पेशागत आधार अब खत्म हो चुका है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने बॉम्बे में आरएसएस के 100 वर्षों पर आयोजित दो दिवसीय एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि राजनेता केवल वोट हासिल करने के लिए जातिगत पहचानों का सहारा लेते हैं। उन्होंने कहा, (एक राजनेता) जाति के आधार पर वोट हासिल करता है। भागवत ने कहा, अगर मैं कहूं कि मैं ब्राह्मण हूं, हर ब्राह्मण मुझे वोट दे, तो मुझे नतीजे मिल जाएंगे। उन्होंने आगे कहा, समाज के मन में जातिवाद है, इसलिए राजनेता जाति को उछालते हैं। भागवत ने कहा कि अगर समाज ऐसे अपीलों पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दे, तो राजनेता अपने-आप बदल जाएंगे। आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि यह कहना सही नहीं है कि राजनेता जातिवादी होते हैं या समानतावादी। उन्होंने कहा, वे वोट से संचालित होते हैं। भागवत ने यह भी कहा कि आरएसएस ने शिक्षा संस्थानों और सरकारी नौकरियों में संविधान द्वारा निर्धारित सभी आरक्षणों का समर्थन किया है। साथ ही जोड़ा कि जब तक जाति-आधारित भेदभाव खत्म नहीं होता, तब तक सकारात्मक भेदभाव (आरक्षण) जारी रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि जातिगत भेदभाव तब खत्म होगा जब जो लोग इसे झेलते हैं, वे खुद कहें कि उन्हें अब भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ता और उन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, यह हो रहा है। लोग कहना शुरू कर चुके हैं कि वे आरक्षण नहीं चाहते और ये लाभ किसी और जरूरतमंद को मिलना चाहिए। यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल कानूनों या नियमों से जातिगत भेदभाव खत्म नहीं होगा और बदलाव तभी आएगा जब समाज में संवेदनशीलता और सहानुभूति होगी। संघ प्रमुख ने यह भी दोहराया कि 75 वर्ष की उम्र पूरी करने के बाद किसी नेता को आदर्श रूप से पद पर रहते हुए काम नहीं करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भागवत दोनों पिछले साल 75 वर्ष के हो चुके हैं।
अगला आरएसएस प्रमुख
भागवत ने कहा कि अगला आरएसएस प्रमुख केवल कोई हिंदू ही हो सकता है, उसकी जाति चाहे जो भी हो।
उन्होंने कहा, एससी या एसटी (समुदाय) से होना कोई अयोग्यता नहीं है, उसी तरह ब्राह्मण होना भी कोई योग्यता नहीं है। भविष्य में कोई एससी/एसटी भी आरएसएस प्रमुख बन सकता है। हमारा विचार यह होता है कि सबसे योग्य व्यक्ति कौन उपलब्ध है.. व्यक्ति को सबसे योग्य होना चाहिए.. और उपलब्ध भी होना चाहिए। मेरे मामले में (जब मैं प्रमुख बना), कई लोग सबसे योग्य थे, लेकिन उपलब्ध नहीं थे। मैं वह व्यक्ति था जिसे जिम्मेदारियों से मुक्त कर नियुक्त किया जा सकता था।
अच्छे दिन पर टिप्पणी
आरएसएस के लिए अच्छे दिन को लेकर पूछे गए सवाल पर भागवत ने कहा, ...अच्छे दिन भाजपा की वजह से नहीं आए, बल्कि बात उल्टी है... हमारे अच्छे दिन हमारी मेहनत से आए... हम राम मंदिर निर्माण के लिए प्रतिबद्ध रहे। जिन्होंने हमारा साथ दिया, उन्हें लाभ हुआ। आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भाजपा जैसे संगठन सभी संघ परिवार का हिस्सा हैं, लेकिन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। उन्होंने कहा, वे सभी स्वतंत्र निकाय हैं, लेकिन उनमें कई स्वयंसेवक काम करते हैं... जरूरत पड़ने पर हम उन्हें सलाह देते हैं, आवश्यक हुआ तो सचेत करते हैं... फैसले उनके होते हैं... लेकिन कभी-कभी उनके पाप हमारे सिर मढ़ दिए जाते हैं, क्योंकि वे हमारे ही स्वयंसेवक होते हैं। भागवत ने कहा, यह साफ समझ लें कि राजनीतिक दबाव मतदाताओं से आता है, आरएसएस से नहीं.... हमारी व्यवस्था वोट-वादी व्यवस्था बन गई है... इसे बदलने की जरूरत है।
75 साल की उम्र पर चुटकी
भागवत ने एक बार फिर कहा कि नेताओं को यह जानना चाहिए कि 75 वर्ष की उम्र के बाद उन्हें पीछे हटकर मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह केवल इसलिए पद पर बने हुए हैं क्योंकि आरएसएस ने उनसे ऐसा करने को कहा है। उन्होंने कहा, आमतौर पर कहा जाता है कि 75 साल की उम्र के बाद किसी पद पर रहे बिना काम करना चाहिए.. मैंने 75 साल पूरे होने पर आरएसएस को सूचित किया, लेकिन संगठन ने मुझसे काम जारी रखने को कहा। जब भी आरएसएस मुझसे पद छोड़ने को कहेगा, मैं ऐसा कर दूंगा, लेकिन काम से सेवानिवृत्ति कभी नहीं होगी... संघ अपने स्वयंसेवकों से आखिरी सांस तक काम लेता है.. और आरएसएस के इतिहास में अभी तक ऐसी स्थिति नहीं आई है जब किसी को सेवानिवृत्त करना पड़ा हो। गौरतलब है कि पिछले साल जुलाई में एक पुस्तक विमोचन के दौरान भागवत की टिप्पणियों ने मोदी की सेवानिवृत्ति पर बहस छेड़ दी थी और कई लोगों ने इसे प्रधानमंत्री को पद छोड़ने का संकेत माना था।
सभी भारतीय एक हैं
भागवत ने कहा कि सभी भारतीय एक हैं, और हिंदू व सिख समाज में एक हैं। आरएसएस लंबे समय से सिख धर्म को हिंदू धर्म के भीतर एक पंथ मानता रहा है-एक ऐसा दृष्टिकोण जिसका सिख समुदाय विरोध करता है। सिख नेताओं ने यहां तक कि आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है। इस्लाम और ईसाई धर्म का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा, इस्लाम को शांति का धर्म कहा जाता है, लेकिन शांति दिखाई नहीं देती। अगर धर्म में आध्यात्मिकता न हो, तो वह प्रभुत्ववादी और आक्रामक हो जाता है। आज इस्लाम और ईसाई धर्म में जो देखा जा रहा है, वह यीशु मसीह और पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। हमें सच्चे इस्लाम और सच्चे ईसाई धर्म का अभ्यास करने की जरूरत है।
भागवत के बयानों का तार्किक प्रति-उत्तर
➧हिन्दुत्व की वैचारिकी में विश्वास रखने वाले जाति व्यवस्था को अपना अभिन्न अंग मानते हैं। इसलिए आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत का कथन- कि आज के समय में जाति केवल राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मौजूद है, क्योंकि उसका पारंपरिक पेशागत आधार खत्म हो चुका है। मोहन भागवत जी का यह कथन निराधार और असत्य है। चूंकि अभी पिछले दिनों यादव समाज के कुछेक पुजारियों ने कथावाचक का काम शुरू किया तो वहाँ के ब्राह्मणों ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया और सोशल मीडिया के माध्यम से देखा गया कि ब्राह्मण स्त्री का मूत्र भी उनपर छिड़का गया।
➧आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि राजनेता केवल वोट हासिल करने के लिए जातिगत पहचानों का सहारा लेते हैं। मोहन भागवत जी इस देश की जनता को बताए कि अगर जाति समाज में महत्वपूर्ण नहीं है तो मोदी पिछले 12 वर्षों से अपने आपको ओबीसी समुदाय का बताकर ओबीसी की वोट क्यों बटोर रहे हैं, इसलिए मोहन भागवत जी का यह कथन तर्कसंगत नहीं?
➧मोहन भागवत ने आगे कहा कि अगर मैं कहूँ कि मैं ब्राह्मण हूँ तो हर ब्राह्मण मुझे वोट दे तो मुझे नतीजे मिल जाएँगे। मोहन भागवत जी एक शातिर दीमाग के ब्राह्मण व्यक्ति हैं, इसलिए वे जब ब्राह्मण कहकर भोले-भाले लोगों की वोट ठगने के लिए जब जनता में जाएँगे तो वह भोली-भाली जनता से कहेंगे कि मैं आपका गरीब ब्राह्मण हूँ, आपके दान पर जिंदा रहता हूँ, इसलिए मैं आपके कल्याण की कामना करूंगा और ईश्वर से प्रार्थना करूंगा की आप सुखी रहे इसलिए मुझे वोट दो।
➧उन्होंने आगे कहा कि समाज के मन में जातिवाद है, इसलिए राजनेता जाति को उछालते हैं, अगर समाज उनकी ऐसी अपीलों पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दे तो राजनेता अपने आप बदल जाएंगे। मोहन भागवत जी से देश की भोली-भाली जनता जानना चाहती है कि समाज के मन में जातिवाद किसने पैदा किया और उससे किसको लाभ है? जाति व्यवस्था को कायम रखने से केवल लाभ मोहन भागवत जैसे चालाक किस्म के ब्राह्मण समुदाय को है, जो जातिगत आधार पर समाज को बांटकर अपना जीवन सुखमय बनाते हैं और समाज को कमजोर करते हैं।
➧मोहन भागवत ने आगे कहा कि राजनेता जातिवादी या सामंतवादी होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि राजनेता हमेशा वोट से संचालित होते हैं। मोहन भागवत जी का यह कथन कि राजनेता जातिवादी या सामंतवादी नहीं होते, वे सिर्फ वोट से संचालित होते हैं तो फिर पिछले 12 वर्षों से केंद्र की राजनीति में और उससे पहले गुजरात प्रदेश की राजनीति में जाति और धर्म के आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण करके जीतने का प्रयास क्यों किया जा रहा है? इस पूरी जातिवादी प्रक्रिया में आरएसएस के कार्यकत्तार्ओं का पूरा योगदान रहा है जिसे मोहन भागवत नकार नहीं सकते।
➧भागवत ने आगे कहा कि आरएसएस शिक्षण संस्थानों में और सरकारी नौकरियों में संविधान द्वारा निर्धारित सभी आरक्षणों का समर्थन करता है। साथ ही जोड़ा कि जब तक जाति आधारित भेदभाव खत्म नहीं होता, मोहन भागवत जी का यह कथन जमीनी हकीकत के विपरीत है। पूरा देश जानता है आरएसएस ही एक ऐसा संगठन है जो देश में आरक्षण का विरोध और दलित का विरोध करता आ रहा है। इतना ही नहीं जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर संविधान निर्माण का कार्य कर रहे थे और संविधान में दलितों/पिछड़ों व अल्पसंख्यकों के लिए मूल अधिकारों की बात हो रही थी तो आरएसएस के प्रचारक और उनके अनुसांगिक संगठन बाबा साहेब का विरोध कर रहे थे और उनके देशभर में पुतले जला रहे थे।
➧भागवत ने यह भी कहा कि जातिगत भेदभाव कानूनों और नियमों से खत्म नहीं होगा, इसके बदलाव के लिए समाज में संवेदनशीलता और सहानुभूति पैदा करनी होगी। मोहन भागवत जी से देश की जनता जानना चाहती है कि आप अपने संगठन को सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बताते हैं तो आपने इस कार्य को अपने 100 साल के सफर में पूरा क्यों नहीं किया? यह कार्य सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र का ही है।
➧75 वर्ष की आयु पूरी करने बाद किसी नेता या संगठन के पद पर कार्यरत नहीं रहना चाहिए। इसपर उन्होंने कोई ठोस उत्तर नहीं दिया बल्कि गोलमोल करके कहा कि जब तक संगठन चाहता है तब तक व्यक्ति बना रह सकता है।
➧भागवत ने आगे कहा कि आरएसएस का प्रमुख केवल कोई हिन्दू ही हो सकता है उसकी जाति चाहे कुछ भी हो। मोहन भागवत जी का यह कथन सत्यता के एकदम उलट है चूंकि आरएसएस अब 100 साल से अधिक उम्र पार कर चुका है उसने अपने इस 100 साल के सफर में कोई भी दलित/पिछड़ा/अति पिछड़ा समाज का व्यक्ति संघ प्रमुख क्यों नहीं बनाया? इसका मुख्य कारण वास्तविकता के आधार पर यह है कि आरएसएस एक ऐसी प्रजाति का जन्तु है जो हमेशा छिपकर कार्य करता है, सामने आकर वह कभी दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार मोहन भागवत भी सामने आकर खुलकर यह नहीं बताना चाहते कि ब्राह्मण ही हमेशा संघ प्रमुख होगा और वह भी चितपावन ब्राह्मण, चूंकि ब्राह्मण ही इस देश में जाति व्यवस्था में सबसे ऊपर और श्रेष्ट बताए जाते हैं। इस व्यवस्था को देखकर देश के दलित/पिछड़े व अत्यंत पिछड़ी जातियों को सावधान हो जाना चाहिए। आरएसएस हमेशा ही देश विरोधी और मानवता विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहा है। साथ में मोहन भागवत जी यह भी बताए क्या वे एससी/एसटी व अत्यंत पिछड़ी जाति के व्यक्तियों को हिन्दू नहीं मानते? उनके आजतक के सफर को देखकर तो यही लगता है कि एससी/एसटी व अत्यंत पिछड़ी जातियां हिन्दू नहीं है।
➧आरएसएस का प्रमुख बनने के लिए मोहन भागवत जी का यह कथन कि संघ का प्रमुख कोई भी व्यक्ति बन सकता है अगर वह योग्य व उपलब्ध हो। भागवत जी को जनता को बताना चाहिए कि योग्यता मापने का पैमाना क्या है और उसे किसने बनाया है? और उसमें कितनी पारदर्शिता है?
➧मोहन भागवत ने अच्छे दिनों को लेकर पूछे गए सवाल पर कहा कि अच्छे दिन भाजपा की वजह से नहीं आए बल्कि हमारे अच्छे दिन हमारी मेहनत से आए। मोहन भागवत जी जनता को यह भी बताए कि क्या आपकी मेहनत संघ प्रचारक मोदी के समय में ही फलदायक हुई है? उससे पहले के 90 साल में क्या आप मेहनत नहीं कर रहे थे? इसका साफ मतलब है कि आपके संघ प्रचारक मोदी के आने के बाद ही आपको सारे सत्ता के लाभ मिले हैं और आपके कार्यालय की बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण भी इसी दौरान हुआ है, जो जनता से छिपा नहीं है, जनता के पास भी इस खेल को समझने के लिए अपनी आँख और बुद्धि है।
➧मोहन भागवत ने आगे कहा कि विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और भाजपा जैसे सभी संगठन संघ परिवार का हिस्सा हैं, लेकिन सभी स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। मोहन भागवत जी से जनता पूछना चाहती है कि इन सभी संगठनों के संचालन के लिए धन की व्यवस्था कहाँ से होती है? उसका सटीक आॅडिट और रजिस्टर मेनटेन क्यों नहीं किया जाता?
➧भागवत ने आगे कहा कि यह जनता को समझ लेना चाहिए कि राजनैतिक दबाव मतदाताओं से आता है आरएसएस से नहीं। हमारी व्यवस्था वोटवादी व्यवस्था बन गई है इसे बदलने की जरूरत है।
➧75 साल की उम्र पर चुटकी लेते हुए भागवत ने एक बार फिर कहा कि नेताओं को यह जान लेना चाहिए कि 75 वर्ष की उम्र के बाद उन्हें पीछे हटकर मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए।
➧75 वर्ष की उम्र के बाद भी आदमी क्रियाशील रहकर बिना पद पर रहते हुए संगठन में कार्य कर सकता है, उसे करते ही रहना चाहिए।
➧भागवत ने आगे कहा कि सभी भारतीय एक है, चाहे वो हिन्दू हो या सिख। मोहन भागवत ने बुद्ध और जैन धर्म के बारे में कुछ नहीं बोला शायद वे इन दोनों को भी हिन्दू ही मानते हैं। लेकिन साथ में यह भी जोड़ा कि सिख समुदाय हमारे इस दृष्टिकोण का विरोध भी करता है। जिन्होंने हमारे संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की है।
➧इस्लाम और ईसाई धर्म का उल्लेख करते हुए मोहन भागवत ने कहा, इस्लाम को शांति का धर्म कहा जाता है, लेकिन शांति दिखाई नहीं देती। अगर धर्म में आध्यात्मिकता न हो, तो वह प्रभुत्ववादी और आक्रामक हो जाता है। आज इस्लाम और ईसाई धर्म में ऐसा ही देखा जा रहा है। मोहन भागवत जी से इस देश की जागरूक व तार्किक जनता जानना चाहती है कि जब केवल आप हिन्दू धर्म के ठेकेदार हैं और हिन्दू धर्म को ही श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर इस देश में रहने वाले अन्य धर्मावलम्बियों से आपके प्रचारक खुले तौर पर नफरत फैलाने का काम क्यों कर रहे हैं? क्या इस नफरत के प्रचार से देश में आरजकता और विखंडनात्मक शक्तियाँ मजबूत नहीं होती? मोहन भागवत जी आपसे इस देश की भोली-भाली तार्किक जनता कहना चाहती है कि आप इस देश में नफरत के बीज बौना बंद करे, और देश की जनता को सकारात्मक रास्ते पर आगे बढ़ाने में योगदान दे। इस देश की जनता आरएसएस के विघटनकारी देश विरोधी नीतियों से अच्छी तक वाकिफ है, उसे मूर्ख न समझा जाये।





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